Saturday, July 14, 2012

bitya


  बिटिया     मेरी
गूंज  उठी  कलरव  से  फूलों  की बगिया मेरी
 घर   आंगन    में बोल  उठी बिटिया  मेरी ,

 चहक  चहक   कर फुदक   रही , फूल फूल    पर

 थिरक   रही, गुन -गुन -गुन की मधुर   ध्वनी  से ,

 गूँज रही , फूलों  की बगिया मेरी ,बोल  उठी बिटिया मेरी

मम्मी ,पापा,बाबा ,दादी कहती , घर आँगन में डोल रही
\कभी  पीठ  पर  ,कभी  पाँव  पर बैठी झूला झूल रही ,
बिटिया मेरी  घर आँगन  में बोल उठी बिटिया मेरी
कभी  नाचती धुन पर ,टी .वी  के    गानों   पर
कभी   ठुमकती   रुनक झुनक   कर पायल को      छनकाती
 घर आँगन में धू म  मचाती बोल रही बिटिया मेरी 

  बिटिया     मेरी
गूंज  उठी  कलरव  से  फूलों  की बगिया मेरी
 घर   आंगन    में बोल  उठी बिटिया  मेरी ,

 चहक  चहक   कर फुदक   रही , फूल फूल    पर

 थिरक   रही, गुन -गुन -गुन की मधुर   ध्वनी  से ,

 गूँज रही , फूलों  की बगिया मेरी ,बोल  उठी बिटिया मेरी

मम्मी ,पापा,बाबा ,दादी कहती , घर आँगन में डोल रही
\कभी  पीठ  पर  ,कभी  पाँव  पर बैठी झूला झूल रही ,
बिटिया मेरी  घर आँगन  में बोल उठी बिटिया मेरी
कभी  नाचती धुन पर ,टी .वी  के    गानों   पर
कभी   ठुमकती   रुनक झुनक   कर पायल को      छनकाती
 घर आँगन में धू म  मचाती बोल रही बिटिया मेरी 
  बिटिया     मेरी
गूंज  उठी  कलरव  से  फूलों  की बगिया मेरी
 घर   आंगन    में बोल  उठी बिटिया  मेरी ,

 चहक  चहक   कर फुदक   रही , फूल फूल    पर

 थिरक   रही, गुन -गुन -गुन की मधुर   ध्वनी  से ,

 गूँज रही , फूलों  की बगिया मेरी ,बोल  उठी बिटिया मेरी

मम्मी ,पापा,बाबा ,दादी कहती , घर आँगन में डोल रही
\कभी  पीठ  पर  ,कभी  पाँव  पर बैठी झूला झूल रही ,
बिटिया मेरी  घर आँगन  में बोल उठी बिटिया मेरी
कभी  नाचती धुन पर ,टी .वी  के    गानों   पर
कभी   ठुमकती   रुनक झुनक   कर पायल को      छनकाती 
 घर आँगन में धू म  मचाती बोल रही बिटिया मेरी 

Friday, March 23, 2012

दिवस परम्परा

गौरैया दिवस

ओह
,यह ' दिवस परम्परा ' मेरी समझ न आई ,

सुबह
सवेरे जब झूले पर मैं गौरिओं को दाना देने आई .
शोर मचाती चीं चीं करती मेरे इर्द गिर्द घिर आईं
कानों को सुख देने वाला मधुर मनोहर शोर नहीं था ,
यह तो कलरव या कल्लोल नहीं था
अरे- अरे यह आज हुआ क्या ?
मैं उन्हें देख घबराई

गौरैयों ने शायद व्याकुल होकर एक सभा बुलवाई
डरी - डरी सी , सहमी- सहमी भोली - भाली औ निरीह सी ,
घर - घर में हर छज्जे , छत में लटक रहे क्यों झूले नभ पर ?
क्या कोई षड्यन्त्र रचा है ? दाने पानी सुंदर मटके रख कर
बुला रहे क्यूँ हमें हरख कर? शहरों की ये नई अदाएं हमें रास न आईं ।
" 'गौरिया का दिवस " मनाकर कहीं और कुछ शामत आई ?
गौरियों ने व्याकुल होकर एक सभा बुलवाई'
ओह यह दिवस परम्परा मेरी समझ न आई'

Monday, November 7, 2011

एक दीया जला लो

उठो ,आंसुओं को पौछ डालो ,
अँधेरा बहुत है ,एक दीया जला लो ।
सिसकियों से शायद सहम से गए हो ,
रोते रोते भरम से गए हो --
उठो आंसुओं को पौछ डालो ।
क्यों हो गुमसुम ,उदास अनमनें से
चलो , हिम्मत न हारो,बढ़ चलो -
उठो ,आंसुओं को पौंछ डालो
जितना डरोगे डराएगी दुनिया
जितना सहोगे सताएगी दुनिया
चलो पास बैठो ,ज़रा मुस्करा दो
हिम्मत न हारो ,एक दीया जला लो
उठो आंसुओं को पोंछ डालो .