Tuesday, December 18, 2012

biitaawarsh

बीता वर्ष

बीता वर्ष ,गया  संघर्ष
.नूतन वर्ष मनाओ  हर्ष  ,
 खुशियों  की  सौगात लिये
,कलियों की  बारात  लिए
,रंग  बिरंगे  फूल खिलें हैं
,उपवन उपवन हिले मिले हैं ,
आशाओं से झूम रहा मन ,
कितने सपनें देख रहा मन ,
छोटी सी खुशियाँ अपार ,
कैसा भी हो मन का विकार
 निराशा  हो या अन्धकार
 मन में उमंग ,उठती तरंग
 नूतन  वर्ष मनाओ हर्ष
 बीता वर्ष गया संघर्ष
,

Sunday, December 16, 2012

patang

पतंग , ह वाओं  के रुख   से ,
ज़मीन पर  डोर के सहारे .
आकाश में कितनी ऊपर तक
जा सकती है ,देखा है तुमने ?

कभी सोचा  है है तुमने ?हाँ 
कभी सोचा है तुमने ?
सपनों को पूरा करने के लिए .
ऊचे  पर सफलता को  छूने के लिये
 ज़मीन पर मजबूती से खड़ा रहना
जरूरी है ,ज रूरी  है ,सच्चाई
इमानदारी ,और  मेहनत के डोर  की
पकड़  जरूरी  है ,ज़ रूरी है .
और  फिर देखो  ,हाँ वो देखो ,खुले
आकाश में  कहाँ कहाँ दौड़ती है ,भागती है
पहुंचती  है ,सफलता की पतंग .
ज़मीन   पर टिकी डोर के सहारे ,
कभी  देखा  है तुमने?कभी सोचा है तुमने?

कभी  सोचा है तुमने ?कभी देखा है तुमने ?

Monday, October 22, 2012

तुम  बोधिसत्व    हो
उस  बोधि  का   नन्हा  सा  एक  अंश 
 शक्तिशाली ,अणु बम  के समान प्रभावशाली ,
 असीम ऊ र्जा ,साहस  और शुदधता के अंश
तुम  बोधिसत्व हो .
निर्मल,सदय़ ,उदार हो ,उस बोधि का एक
नन्हा सा अंश ,
आंसुओं   को  पोंछ  दो,
चिंताओं  को  छोड़ दो
निराशा ,को दू र कर ,
सोचो ,अपने मूल रूप  को
अपराजित,अपरिमेय , जागृत .
तुम बोधिसत्व  हो
इश्वर के अंश ,निर्बंध ,
तुम्हें कोंई पराजित नहीं कर सकता
शक्तिशाली ,अणु   बम के समान   प्रभावशाली
तुम  बोधिसत्व हो
तुम बोधिसत्व हो .

Friday, August 17, 2012

   मन   उदास है
 मुट् ठियों    से   रेत  जैसे  ,  छूटता सब  जा रहा है .
कौन  सी  है तिक्तता  या कौन सी रिक्तता ,
दिल डूबता सा जा रहा है .
क्यूँ  ये  सूनापन घिरा है, क्यूँ ये बेचैनी  बढी है ,
रौशनी में भी अँधेरा  छा  रहा है ,
मुट्ठियों  में रेत  जैसे छूटता   सब जा रहा है .
यूँ तो  सब कुछ पास  है
 फिर भी .अकेला लग रहा है ,छू ट ता सब जा रहा है .
 गहरे भवंर  में , और दलदल पास है ,
छूटता   इक -इक सहारा जा रहा  है
सुस्त  अलसाया हुआ  मन ,
भीत   भरमाया हुआ मन .
 क्यूँ  सहमता जा रहा है ,छू ट ता सब जा रहा है .

Saturday, August 4, 2012

mun ke paakhii

   मन    के   पाखी

उड़  जा ,उड़  जा   मन   के पाखी ,
 तू   अनंत    की    ओर .
 तन का   पिंजर    छोड़ ,
उड़  जा , उड़  जा , मन के  पाखी ,
 तू  अनंत की    ओर .

 अंगों   के बंधन  में कसमस ,
और  छूटने को  फिर   . बेबस
उड़   जा, उड़  जा , मन  के पाखी ,
तू अनंत   की   ओर .
 दूर  दूर  फिर ऊंचा ऊंचा  ,
धरती  का फिर कुछ   ना  दीखे
यह  संसार भरम  की  बाती ,
इसका  ना  कोई   छोर .

उड़   जा   उड़   जा ,मन  के   पाखी .
तू  अनंत की ओर.

चहक   रहा था ,महक  रहा .था
जीवन  का यह उपवन सारा .
मौसम  का जब  तेवर बदला ,
सब  कुछ तहस नहस कर डाला .
समय ,भाग्य  को किसने   जाना?
जाना  ,फिर भी  कब पहचाना

उड़   जा , उड़ जा ,मन  के पाखी .
 नए  भोर की ओर   ,
 नव बसंत  की ओर   .
तू  अनंत की ओर .




Monday, July 23, 2012

 बुढ़ापे     का     बचपन
लौट   रहा है  शायद बचपन ,याद  आ रही है पलपल की .
घिसी  बर्फ के गोलों पर ,रंग बिरंगे  मीठे  शरबत 
 बेसन की स्वादिष्ट lataii   चट पट  चाट   रसीले गुपचुप
कालेज  के बाहर  की gupshup खिल खिल
 ,ठिलठिल मस्त मौज की .


शायद  बचपन   लौट रहा है ,याद आ रही है पल पल की         
काँधें  पर  लटकाए   कांवर  फेरी वाला  आता  था , 
रबडी    दही  और   मलाई  ,पूछ पूछ खिलवाता था
" फेरी वाला कब  आएगा  ?उसे  देखने  जाती  हो  "
पेपर ,फिल्टर  और सोख्ता    मिली  मलाई     खाती  हो ?

ऊपर से माँ  थी चि ल्लाती ,डांट -डपट  कर  मुझे बुलाती
शायद बचपन लौट रहा है ,याद आ रही है पल पल की .
वही  रूठना , वही मनाना ,वही फूलना वही पिचकना .

तब अम्मा और बाबूजी थे ,अब है बेटा बेटी अपना ,
फुसलाते बहलाते रहते ,तरह  तरह के मान मानते .
क्यूँ  रुठी हो ?क्यूँ बिफरी हो ?क्यूँ भूखी हो?क्यूँ फूली हो?

 मुझको खाना है जुबजूबी या फिर   चाकलेट  की गोली '
छोडो  भी माँ ,अब  यह जिद  अपनी . मधुमेही हो यह क्यूँ भूलीं ?
अच्छा  .... देखो टच मोबाइल ,तुम्हें चाहिए था ना  बोलो ?
लैपटाप  पर काम करोगी ....मीठे की जिद छोड़ो .....?

चलो घूमने ,तुम्हें दिखाएँ पिक्चर .या ...गाने सुनवाएं


होने वाली मैं    सत्तर की ,बता रही मैं अपने मन की
शायद बचपन लौट रहा है  याद आ रही है पलपल की 

Saturday, July 14, 2012