Sunday, January 6, 2013

apnaa ghar



                       अपना घर                    

    उफ पन्द्रह         दिनों     से   लगातार    सामानों की पैकिंग करते- मानों कमर ही टूट गयी हो। रिटायरमेंट के बाद प्रायः जीवन कितना खाली और बेगाना सा हो जाता है। कितने शौक से यह घर बनवाया था। हमने राची के इस पाश कलोनी में अपना घर दस वर्ष बाकी थे तब सरविस के एक या दो बेडरूम में काम कैसे चलेगा कम से कम तीन बेडरूम तो होने ही चाहिए और एक गेस्टरूम तो होने ही चाहिये और एक गेस्टरूम एक रानी के लिए, एक राजू पप्पू का और एक हम लोगों का यानी        मिस्टर   एंड       मिसेज  प्रकाश का। ऐसा लग ता था इससे कम में तो हो ही नहीं सकता औकात से ज्यादा लोन लेकर सजाया सँवारा     घर। बाथरूम में मार्बल, सफेद संगमरमर टाईल्स। बड़े से लान के लिए खुली जगह, अगल बगल सुन्दर फूलों की क्यारियों की जगह। मखमली घास के लाॅन को आहलादकारी कल्पना, प्रयास भी किये लेकिन जब घर बन कर तैयार हुआ तो जैसे अपनी नींव ही खोखली हो गई थी।

    नौकरी के तो आभी दस साल बाकी है लोन भी काफी हो गया है और अभी तो इस घर में आया नहीं जा सकता? क्यों न इसे किराये पर लगा दिया जाय लोन भी सध जायेगा और घर भी मेन्टेन हो जायेगा। दूसरा सु-हजयाव प्रकाश का था मैं बच्चों का लेकर इस घर मे    रंहूँ   पढ़ाई  वगैरह के लिए एक ही जगह टिक कर रहना ठीक होगा। प्रकाश आते-जाते रहेंगे। समय बीतते देर नही लगती लेकिन मै प्रकाश के इस सु  झाव   पर किसी हाल में राजी न हुई। ललक भरी आखों सक देखते हुए सुन्दर सजा कर बना कर घर दे दिया बड़ी प्राइवेट के जनरल मैनेेजर को और लौट आये हम लोग उसी पुराने से बदरंग, सीमेंन्ट उखड़े सरकारी क्वार्रटर में।

     सोचा यहाँ  क्या? तबादले वाली सरकारी नौकरी है इस घर से क्या मोह क्या इस पर मेहनत करना जब अपने जायेंगे शौक पूरे कर लेंगे। मध्यमवर्गीय परिवार के सरकारी अफसर की पत्नी की हैसियत मैने भी यही सोच लिया था। पर तब क्या पता था कि जब सब तरफ से ठीक-ठाक सुविधा सम्पन्न घर बन कर तैयार होगा और उसमे आने का अवसर मिलेगा तो उसे भोगने के आनन्द से सहेजने सवारने की, परिवार के साथ मिलकर रहने की जीवनी शक्ति ही चुक जायेगी।

     60 वर्ष की उम्र में अपने इस विशाल घर के बरामदे में चारों ओर फैले 30 वर्षांे की गृहस्थी का सामान पैकटों और बोरियों में लिपटा पड़ा मानों हम पर हॅंस रहा था। प्रकाश जी सामानों की गिनती करवाने और कुलियों से उतरवा कर अभी सुरक्षित स्थान पर रखवा रहे थे और मैं उन सबके बीच कुर्सी पर बैठ कर चुपचाप सोच रही थी।

     अपने, हाॅं अपने इस चिरप्रतीक्षित घर में आकर इतना गहरा सूनापन क्यों वह उछाह क्यों नही? हाँ  शायद, रानी राजू और पप्पू नही है जो इसको बनवाते समय चहक-चहक कर अपने-अपने कमरों की प्लानिंग और घर की सजावट सोच रहे  थे। इस सामने वाले कमरे मे यह बड़ी खिड़की तो इसलिए बनी थी कि रानी को बहुत शौक था कि वह खिड़की और बाहर रात की रानी    की भीनी-भीनी खुशबू उसमें नई स्फूर्ति और ताज़गी देती रहेगी। मगर वह तो इस कमरे में एक दिन भी बैठ करपढ़ी  नहीं। जहां   जहाँ     पोस्टिंग  हुई वहां पर छोटे-छोटे कमरों में तीनें भाई बहन लैम्प की रोशनी से जू  झते जूझते कालेज की पढ़ाई  खत्म हो गई और फिर तो हास्टल और हास्टल। अभी पिछले हीे साल तो शादी की उसकी। खुश है अपने घर में। कितना सुन्दर है उसका छोटा सा सुन्दर और सलोना सा फलैट।मगर यह कमरा उसी के लिये बनवाया था। आयेगी भी तो साल दो साल मे आठ दस दिनों के लिये। अमेरिका में बसी दूर इतनी दूर कि----

      बेटा राजू, कितना   रोया      था कि मेरा कमरा अलग-ंउचयथलग होना चाहिए मेरे दोस्त     आयेगें     ,तो कंबाइंड   स्टडी    करूँगा  अपनी   तरह  -सजाऊँगा    । उसको भी तो अब देश विदेश के चक्कर लगाते क्या कभी इस कमरे की याद आती होगी जिसमें  वह रहा  ही नहीं। बचपन और किशोरावस्था के सपने,         माँ -बाप के इर्दगिर्द घूमने वाले बच्चों की दुनिया कब परिपक्व होकर अपना दायरा खुली दुनिया में     सजाने   लगी कुछ पता ही न चला और अब मर्चेंट नेवी में बहू के साथ समुद्र की लहरों पर जलयानों पर अठखेलियाँ  करता    वह जीवन की  ऊंचाइयाँ          नाप रहा है।

       एक गाड़ी सामान आ चुका है दूसरा आने वाला है।पेड़ पौधे गमले क्राकरी सोफा टी.वी. वी.सी.आर. सब। प-सजय़ लिख लो अच्छी नौकरी उददेश्य रखो हर बार बच्चों को यही शिक्षा दी। अब सब कुछ है तो साथ बैठकर देखने के लिये बच्चे नही हैं। घोसलांे से चिडि़योे के बच्चे पर उगते ही उन्मुक्त आकाश में उड़ानें भरनी शुरू कर देते है अब नीड़ से मोह कैसा? आत्मविश्वास आया बच्चों में व्यक्तित्व निखरा पुष्ट हुए। जिनके लिए नीड़ बना समय बीता। उन्हें अपना नया नीड़ रचना है उनके लिए तिनके जुटाने है बड़ी लम्बी यात्रा करनी है अब उनके इस नीड़ रहने की आशा कहाँ ?

        किरायेदारों ने घर खाली कर दिया और जाने से पहले कुछ भी देख भाल नही की उन्हे पता जो चल गया था कि हम लोग आने वाले हैं।

        अब सामने उजाड़ पड़ा लाॅन, फूलों की आस लगाये क्यारियाॅ, नौकरी पर तो नौकर चाकर माली मिल भी जाते थे।

        पेंशन के पैसों से क्या-ंउचयक्या करेंगे कभी तो इस कालोनी में आकर रह नही जीवन की इस सन्ध्या मंमें क्या नये लोगो से वह अपनापन इस नये जगह पर नये    तरह  से जीवन शुरू करना आसान नहीं। ऐसा लग रहा  हैभविष्य की आशा में शायद मैनें अपना वर्तमान खो दिया।  तात्कालिक सुख तो मैं शायद भूल ही गई थी बच्चे ही जीवन रथ की धुरी है हर व्यक्तिव का जीवन उनमें ही केन्द्रित होकर घूमता है उनको पालने-ंउचयपोसने के लिये सुविधा जुटाना है नौकरी करता है जीवन इतना अधिक व्यस्त और यान्त्रिक हो उठता है कि वे गौण हो जाते है। भविष्य की सुरक्षा का भय, क्रोध, हड़बड़ी जीवन की भागदौड़, घबराहट इतनी हावी हो जाती है कि हम जीवन के छोटे सुखों और खुशियों के आनन्द को भूल जाते है। अथक परिश्रम भागदौड़ जमा की गई भौतिक उपलब्धियाँ  शारीरिक सुख तो दे देती है मगर सामीप्य-सानिध्य प्यार बच्चों का साथ, जीवन के हर पल, हर क्षण के भरपूर आनन्द लेने से वंचित कर देती है।

        अरे! अनु उठो   किस सोच में डूबी हो। जरा इन आदमियों के लिए चाय वगैरह बनाओं। बड़ी मेहनत की है इन्होंने, मु झे निष्क्रिय देखकर फिर बोले-उठोदेखो यह तुम्हारा घर अब चाहे जैसे सजाओ अपनी सारी इच्छायें पूरी कर लो।मेरी आखों से आ सूँ गिर रहें है३ण्ण्अकेले इस घर मे अब हम और तुम अकेले रहेंगे। मैं तो सोच रही थी हम सब साथ रहेंगे रानी राजू पप्पू मगर यह कैसे हो सकता हैसमय बीत गया है

        भारी कदमों से मै किचन की ओर बढ  चली।      

Sunday, December 30, 2012

main roii

  मैं रोई .
मैं रोई ,फूट -फूट कर रोई .
क्यूँकी ,

आज वह  मर  गई .
तेरह दिनों तक ज़िंदा लाश थी
.अहसास था ,स्पनंदन था
.ज़िंदगी से हार गई
..हाँ ,आज वह मर गई
 वह कौन  थी तुम्हारी ?
न देखा .न जान न पहचान ,
न बेटी ,न माँ न बहन .हाँ
वह सामाजिक रिश्ते में न सही ,
मगर मेरे मन का हिस्सा थी
,तन का टुकड़ा थी खून  से सिंची
.।मेरे सीने  से जकड़ी थी  मेरी अपनी थी
पीड़ा  हर आह सिहराया ,तड़पाया .
वह इंसानियत थी जो इतने करीब थी .
हैवानियत  के दरिंदों बोटी -बोटी काटी
 मासूमियत का परिंदा ,सपनों  का गुलिंस्ता
 .वह मासूम फाख्त्ता थी ,वह इंसानियत थी ,
जिसकी मौत   पर  मैं रोई फूट फूट कर रोई
,अपनी लाचारी पर ,अपनी कमजोरी पर
 ,मैं कुछ कर न सकी ,क्यों कुछ कर न सकी
मैं रोई  फूट -फूट कर रोई 

Tuesday, December 18, 2012

biitaawarsh

बीता वर्ष

बीता वर्ष ,गया  संघर्ष
.नूतन वर्ष मनाओ  हर्ष  ,
 खुशियों  की  सौगात लिये
,कलियों की  बारात  लिए
,रंग  बिरंगे  फूल खिलें हैं
,उपवन उपवन हिले मिले हैं ,
आशाओं से झूम रहा मन ,
कितने सपनें देख रहा मन ,
छोटी सी खुशियाँ अपार ,
कैसा भी हो मन का विकार
 निराशा  हो या अन्धकार
 मन में उमंग ,उठती तरंग
 नूतन  वर्ष मनाओ हर्ष
 बीता वर्ष गया संघर्ष
,

Sunday, December 16, 2012

patang

पतंग , ह वाओं  के रुख   से ,
ज़मीन पर  डोर के सहारे .
आकाश में कितनी ऊपर तक
जा सकती है ,देखा है तुमने ?

कभी सोचा  है है तुमने ?हाँ 
कभी सोचा है तुमने ?
सपनों को पूरा करने के लिए .
ऊचे  पर सफलता को  छूने के लिये
 ज़मीन पर मजबूती से खड़ा रहना
जरूरी है ,ज रूरी  है ,सच्चाई
इमानदारी ,और  मेहनत के डोर  की
पकड़  जरूरी  है ,ज़ रूरी है .
और  फिर देखो  ,हाँ वो देखो ,खुले
आकाश में  कहाँ कहाँ दौड़ती है ,भागती है
पहुंचती  है ,सफलता की पतंग .
ज़मीन   पर टिकी डोर के सहारे ,
कभी  देखा  है तुमने?कभी सोचा है तुमने?

कभी  सोचा है तुमने ?कभी देखा है तुमने ?

Monday, October 22, 2012

तुम  बोधिसत्व    हो
उस  बोधि  का   नन्हा  सा  एक  अंश 
 शक्तिशाली ,अणु बम  के समान प्रभावशाली ,
 असीम ऊ र्जा ,साहस  और शुदधता के अंश
तुम  बोधिसत्व हो .
निर्मल,सदय़ ,उदार हो ,उस बोधि का एक
नन्हा सा अंश ,
आंसुओं   को  पोंछ  दो,
चिंताओं  को  छोड़ दो
निराशा ,को दू र कर ,
सोचो ,अपने मूल रूप  को
अपराजित,अपरिमेय , जागृत .
तुम बोधिसत्व  हो
इश्वर के अंश ,निर्बंध ,
तुम्हें कोंई पराजित नहीं कर सकता
शक्तिशाली ,अणु   बम के समान   प्रभावशाली
तुम  बोधिसत्व हो
तुम बोधिसत्व हो .

Friday, August 17, 2012

   मन   उदास है
 मुट् ठियों    से   रेत  जैसे  ,  छूटता सब  जा रहा है .
कौन  सी  है तिक्तता  या कौन सी रिक्तता ,
दिल डूबता सा जा रहा है .
क्यूँ  ये  सूनापन घिरा है, क्यूँ ये बेचैनी  बढी है ,
रौशनी में भी अँधेरा  छा  रहा है ,
मुट्ठियों  में रेत  जैसे छूटता   सब जा रहा है .
यूँ तो  सब कुछ पास  है
 फिर भी .अकेला लग रहा है ,छू ट ता सब जा रहा है .
 गहरे भवंर  में , और दलदल पास है ,
छूटता   इक -इक सहारा जा रहा  है
सुस्त  अलसाया हुआ  मन ,
भीत   भरमाया हुआ मन .
 क्यूँ  सहमता जा रहा है ,छू ट ता सब जा रहा है .

Saturday, August 4, 2012

mun ke paakhii

   मन    के   पाखी

उड़  जा ,उड़  जा   मन   के पाखी ,
 तू   अनंत    की    ओर .
 तन का   पिंजर    छोड़ ,
उड़  जा , उड़  जा , मन के  पाखी ,
 तू  अनंत की    ओर .

 अंगों   के बंधन  में कसमस ,
और  छूटने को  फिर   . बेबस
उड़   जा, उड़  जा , मन  के पाखी ,
तू अनंत   की   ओर .
 दूर  दूर  फिर ऊंचा ऊंचा  ,
धरती  का फिर कुछ   ना  दीखे
यह  संसार भरम  की  बाती ,
इसका  ना  कोई   छोर .

उड़   जा   उड़   जा ,मन  के   पाखी .
तू  अनंत की ओर.

चहक   रहा था ,महक  रहा .था
जीवन  का यह उपवन सारा .
मौसम  का जब  तेवर बदला ,
सब  कुछ तहस नहस कर डाला .
समय ,भाग्य  को किसने   जाना?
जाना  ,फिर भी  कब पहचाना

उड़   जा , उड़ जा ,मन  के पाखी .
 नए  भोर की ओर   ,
 नव बसंत  की ओर   .
तू  अनंत की ओर .