Sunday, March 24, 2013

Shiksha---jeene ki kala

                                                    शिक्षा-जीने की कला
समाज के वर्तमान समय में बच्चों में शिक्षा के प्रति लोगों में एक क्रान्ति की भावना का विकास हुआ है। चली आई हुई वर्तमान शिक्षा पद्धति और उसके प्रभाव ने लोगो को निराश और हतोत्साहित किया है। और जब चारों ओर से सब दरवाजे बन्द दिखाई पड़ते है तो एक नया झरोखा और आशा की किरण, प्रकाश का दीपक प्रस्फुटित हो उठता है। जनमानस उद्विग्न और व्याकुल होकर सोचने लगता है नई दिशाये, नये विचार सिद्धांत बदलाव तथा परिवर्तन। यह परिवर्तन सकारात्मक होता है, उद्देश्यपूर्ण होता है और अनेक लोगों का सामूहिक प्रयास सार्थक होने लगता है। जन समर्थन मिलने लगता है। परिणाम, प्रभाव अपनी पूरी सक्रियता से दिखाई पड़ने लगता है। प्रायः संघर्षों में नये संकल्प बनते है।
आप सबकी चिन्ता का विषय यही है कि शिक्षा में गुणवत्ता का विकास किस प्रकार हो तथा उसके सुधार से वह आज के युवा वर्ग को किस प्रकार सहायता कर सकती है। सही और गलत उचित और अनुचित की पहचान करने में तथा समाज के आस-पास के वातावरण के पति जागरूकता तथा उसे समझने तथा जानने मे।
    शिक्षा हमारे देश में कल के सक्षम नेताओं के विकास करने में कैसे सहायक हो सकती है? ऐसे नेता जो सबको समान रूप् से न्याय दिलाने में समर्थ हो। जो जड़ से जाति -पाति , उच-नीच, गरीब और अमीर के भेद को जड़ से उखड़ फेके और देश को सुरक्षा प्रदान कर प्रगति के पथ पर अग्रसर करें। हमारे सपनों के भारत को मूर्त रूप दे सकें।
नैतिकता का पतन सही गलत अनुचित की सीमा को पार कर जाना। विवके बुद्धि का। यह बताता है कि शिक्षा अपनी गुणवत्ता के प्रभाव को जमा पाने में असफल सी हो रही है। दोष किसे दिया जाय। यह समय इन आलोचनाओं पत्यालोचनाओं का नही है वरन् ठोस कदम उठाने का है। शिक्षा का व्यापक अर्थ है मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समुचित विकास छात्रों के सन्दर्भ-कक्षाये उत्तीर्ण करते हुए अंको और डिग्री के प्रशस्तिपत्र किसी को शिक्षित नही बनातें। वह ज्ञान का भण्डार विकसित करते है सूचनाओं को एकत्रित करते है यह भी शिक्षा का एक भाग, अंग है जिसे हम थेओरी  कह सकते है। परन्तु डिग्री वास्तविक शिक्षा में तभी कार्यान्वित /बदलती है/ जब उन सूचनाओं और ज्ञान को हम नित्य प्रति दैनिक जीवन में आवश्यकता पड़ने पर समाज, मनुष्य के कल्याण के लिये इस्तेमाल करने में स्वतंत्र सफल और सक्षम हो। वह तभी सार्थक है। संवेदनाओं के साथ सामाजिक नैतिक आर्थिक रानैतिक सभी क्षेत्रों में उसे लागू कर सके।
यह एक कठिन कार्य अवश्य है। मगर असंभव नहीं। कहा जा सकता है बचपन से जो बच्चों के अन्दर नैतिकता के बीज बोये जाये वो बड़े हेकर पनपेंगे और समाज तथा मानवीय स्तर पर, हर वर्ग को ऊंचा  उठायेगे उसकी जड़े काफी गहरी और मजबूत होगी। है तो बड़ा ही आदर्शात्मक। परन्तु विडम्बना यह है कि ऐसी नयी पौध बढ़ने से पहले ही समाज के तथाकथित महान ठेकेदारों द्वारा कुचल दिये जाते हैं। इससे पहले कि नये स्वच्छ वातावरण का निर्माण वो कर सके वर्तमान जीवन के भ्रम के चकाचैंध में खो जाते है।
      आवश्यकता है कि उन्हे भी युक्तियाँ  मालूम हो कि इस विषम चक्रव्यूह से सफलतापूर्वक निकल कर अपने आदर्शों और सिद्धांतो का परचम लहरा सके। उन्हे अपने आदर्शो पर हर हालत में सफल होकर दिखाना होगा। तभी सारे प्रयास सफल होंगें। सुझाव मात्र यह है कि जिस प्रकार वट वृक्ष की लम्बी जटाये वृक्ष के उपरी भाग से लटक कर जमीन में गहरी मजबूत जड़े बनाती है उसी प्रकार समाज में, घर में परिवार में, कार्यक्षेत्र में, आॅफिस में बाजारों  में उपर-नीचे, अगल-बगल चारों दिशाओं से परिवर्तन की प्रक्रिया क्रियाशील हो एक ही समय में एक ही साथ तो अपेक्षित परिवर्तन होने में समय न लगेगा।
 जिनके पास वर्तमान में यह शक्ति / धन, पद, बल/है उन्हें जाग्रत करना होगा। उन्हें विश्वास कर इस कार्यक्षेत्र के लिये उन्मुख करना कहीं अधिक व्यवहारिक होगा। उसके परिणाम तुरन्त दिखाई पड़ेगे अपेक्षा इसके कि जमीन को खोद कर नीव ही बदली जायें।
सत्यता, इमानदारी, कार्यकुशलता नैतिकता के धनी व्यक्तियों को ढ़ूढ कर अधिक से अधिक संख्या में उजागर किया जाये। मान्यता दी जाये ।तो वही दूसरो के लिये आदर्श और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का विषय और प्रेरक बनेगा सही दिशा में सोचने के लिये लोग बाध्य होने लगेंगे और जब लोगों को इसकी प्रमाणिकता व्यवहारिक जीवन में अधिक से अधिक मिलने लगेगी तो समाज का वातावरण बदलने में समय न लगेगा। यह परिवर्तन उपर-नीचे, बड़े-छोटे, नये पुराने अगल-बगल चारों ओर से होगा और इसके हवा पानी में ये कोमल स्वस्थ नैतिकता के बीज पनपेंगे, विकसित होंगे, लहलहायेंगे और कोई भी भ्रष्टाचार, बेइमानी धोखाधड़ी षड़यंत्र का प्रचण्ड झोंका उन्हें मुरझा नहीं सकेगा।

Sunday, February 24, 2013

Lahoo ke do rang

                                                                लहू के दो रंग
किसी की वाणी में इतना भी जादू हो सकता है, खेलों में इतना अधिक प्रभाव हो सकता है कि उसे देखे बिना ही केवल पढ़ उसके पीछे चल पड़े थे। वैसा ही कुछ शायद मेरे साथ भी था। स्थानीय समाज सेविका श्रीमती दामोलकर को देखने का मौका मुझे कभी न मिला था जब तब उनकी वार्तायें रेडियो पर सुनी थी। स्थानीय दैनिक-अखबार में अक्सर उनके लेख छपते। रविवार के दिन तो विशेष कालम में उनका लेख पढ़कर मेरा मन रोमान्चित हो उठता। दया से द्रवीभूत हो उठता मेरा मन समाज के उन असहाय शोषित निर्धन वर्ग विशेष के प्रति।कितनी कयणामयी होगी वह ममता की मूर्ति। आज जब अपना विश्लेशण करने बैठी हूँ तो लगता है कि कहीं मेरा किशोर मन उनके प्रति एन्फालुएल्टेड या हीरो वर्शिप की भावना से ग्रसित था।
    इस बार हिन्द्री दैनिक में उनका लेख था ‘‘हम एयर कन्डिशन्ड भव्य सुख सविधाओं से युक्त कमरे में बैठ कर उस मजदूर दलित वर्ग के दुख और शोषण की कल्पना भी नहीं कर सकते। छोटे-छोटे बालकों से मजदूरों के समान रात दिन काम करवाना उनके साथ अन्याय ही नहीं उनकी हत्या करना है छोटी सी खिलती कली को मसल डालना है। हमें इसके विरूद्ध आवाज उठानी चाहिए। ’’कितनी ही सभाये उनके द्वारा आयोाजित हुई होंगी। कितनों को उन्होंने मानवीय अधिकारों की लड़ाई में  विजय दिलावाई। बच्चों को हमने अधिकार दिलवाये उनके माँ बाप, तथा नारियों को शोषण की नारकीयता से मुक्ति दिलवाई। धन्य है वह नारी जिसने इतनी जागरूकता फैलाई। चैतन्यता का बीज बोया उनकी अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से परिचय करवाया।’’
    जब-जब मैं कुछ दूर पर बन रहे सामने वाले घर में बच्चों को दौड़ कर एक-एक ईटों को उठाते, करीने से सजाते, जमीन को खोदने का असफल प्रयास करते मैं देखती तो म मिसेज दामोलकर की बड़ी याद आती है। काश वह यहा होती तो मैं उन्हें यह दृश्य दिखला पाती।
     राची  के अशोक विहार पुरम कालोनी बड़ी पाश, मुख्य शहर से दूर, दोनों तरफ गाव से घिरी, एक तरफ छोटी पहाड़ी नदी के निकट बसी बड़ी तेजी से विस्तार पा रही है। चैड़ी साफ सुथरी सड़कें सुन्दर सा मार्केट, कम्यूनिटी हाल कुछ नये नर्सरी स्कूल आदि तथा एक से बढ़कर एक सुन्दर घर तथा भव्य इमारते। किसके पास कितना पैसा है और वह उच्चवर्ग की किस श्रेणी में स्वयं को रखता है इसका अन्दाजा इमारतों, भवनों को देखकर बड़ी ही सहजता से लगाया जा सकता  है। गाव  के पास बसा होने के कारण गाव की मोहकता, शहर की भीड़-भाड़ से दूर बहुत शान्त और मनोरम। कुनमुना-कर सोये शान्त शिशु सा। सुबह बड़ी ही सुहावनी।
     पास के गाव  के अधनंगे बच्चे, कन्धे पर दोनो ओर छोटी-छोटी बांस  की टोकरिया रखे, घूमने के आकर्षण से घिरे गोबर लकड़ी चुनने के बहाने टोलियाँ बनाकर सुबह-सुबह ही निकल पड़ते हैं। शायद उन लोगों में भी होड़ लगी रहती है कि कौन सबसे पहले और सबसे ज्यादा सामान इकट्ठा करता है। या फिर सिर पर टोकरी, हाथ में छोटी-छोटी कुदालियाँ  लिये गाव  की स्त्रियाँ गायों के लिये, घास छिलने, साहब लोगों के बड़े विशाल बॅगलों के चक्कर काटती है। दो तीन औरतों लड़कियों का दल रहता है। मौका देखते ही धड़ाधड़ गेट खोल कर भीतर घुस जाता है। आठ बजते सभी घरों से मोटर गाडि़यों का निकलना शुरू हो जाता है 10 बजते पूरी कालोनी खाली।
     मै इसी कालोनी के एक बड़े बंगले के गैरेज पोर्शन में रहती हॅू कालेज में बीण्एण् की छात्रा हूँ । अपनी मासी के साथ लगभग दो साल से रह रही हूँ 10 बजे से मेरे क्लास होते है। अक्सर ही बाल्कनी में आ खड़ी होती हूँ । सामने कुछ दूरी पर दो मंजिला घर बन रहा है। बड़े जोर शोर का रूप सजाया सवांरा जा रहा है। मैं देखती हूँ  9 बजते-बजते मजदूरों और रेजाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक मेमसाबह रोज समय पर घर बनवाने आती है। कोई दिन भी ऐसा नहीं बीतता जिस दिन किसी मजदूर के पैसों को लेकर झड़प न होती हो चेहरा आदि तो दिखाई नहीं पड़ता मगर हल्ला गुल्ला सबका घेरा बनाकर एक साथ खड़ा हो जाना और फिर कुछ देर बाद काम का शुरू होना दिखाई पड़ता था।
     दो तीन दिन से देख रही हूॅं कि गोबर चुनने वाले छोटे-छोटे बच्चों की टोली जुटी उस घर के मेम साब के आस-पास खड़ी होती है और काफी हंस कर बाते करती रहती है। नंगे बदन 8-12 साल के दुबले पतले बच्चे। मुझे लगा कितनी अच्छी होगी वो।
    दूसरे दिन ठीक नौ बजे वही बालक टोली बड़ी मुस्तैदो से अपने काम में जुटी है। फावड़ा लिये कोई खोद रहा है कोई  घास उखाड़ कर फेंक रहा है कोई ईंटे लगा रहा है। वे बाल गोपाल ही लग रहे थे। फूलों की क्यारी बन रही थी फूल जैसे कोमल हाथों से। बच्चों में काम करने का उत्साह, गोबर से भरे बहंगी को कोने में रखकर कपड़े के एक छोटे टुकड़े से अधोतन को ढ़के हुए ये बालगोपाल कितने दृढ़ प्रतिज्ञ लगते। आशा दीप से जल रहे उनके नेत्र धन प्राप्ति के लोभ में साम्यर्थ से भी अधिक कुछ करने की तैयारी कर रहे थे।
    मई जून की चिलचिलाती धूप। बाहर गर्म हवा के बगूले और लू एक क्षण भी बाल्कनी में खड़ा होना मुश्किल है। कालेज से लौटते-लौटते 12ः 30-01ः 00 बज ही जाता है। गला प्यास से सूख जाता है पसीने से तरबतर आकर घर में तेजी से पंखा खोल देती हूँ  मगर ये कर्मयुद्ध के सिपाही नन्हें बाल मजदूर तैनात हे अपने मोर्चे पर। कुछ देर तक लेटती हूँ  मगर मन नहीं लगता तो दरवाजा खोल कर बाहर झाकती हूँ  गर्म हवा का एक झांेका, झपास मार कर अन्दर घुस जाता है। खड़े होकर सामने देखती हूँ घर बनने का काम पूर्ववत हो रहा है उस पर इन गर्म तीखी प्रकाश और ताप काह कोई प्रभाव नहीं। दरवाजा बन्दकर फिर लेट जाती हूँ । पास में अधूरी पड़ी पुस्तक को फिर से उठा कर लेती हूँ । कुछ पल पढ़ती हूँ कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आती है। उठती हूँ -दो छोटे बच्चे एक घायल बच्चे को सहारा दिये दरवाजे पर खड़े है। कुछ दवा दीजिये न’? कितनी ज्यादा चोट लगी है इसे,कहाँ से लगी चोट? उस घर में हम काम करते है। तुम लोग --- क्या काम करते हो ---? अभी सुबह का स्कूल है दिन भर खाली रहते हैं। थोड़ा कमा लेते है।’’कितना मिल जाता है?- - - मैने घाव को पानी से धोते हुए पूछा हम तीनों के एक-एक रूपया रोज। दो दिन हो गये 6 रूपये मिल गये कुल पैसों मे 6 रूपये और मिल जायेंगे क्या करोगे इन रूपयों का।’’ एक दूसरे के पीछे छिपते शरमाते 8-12 वर्षों के उत्साही बच्चे बोले 3,5,7 मे पढ़ते हैं हम। थोड़ा-थोड़ा जमा कर लेंगे स्कूल के पोशाक के लिये।’’ और नाम क्या तुम लोगों का,- बाही, मुन्ना और बन्दी।
    बन्दी उसमें सबसे बड़ा था बाही उसके बाद और मुन्ना शायद सबसे छोटा। लेकिन काम  करने का उत्साह, की चमक उसमें सबसे ज्यादा थी। जिस लगन से वे काम करते मेरे मुख से तारीफ निकल ही जाती। और एक दबी सी आह भी। इतने छोटे बच्चे कुल मिला कर किसी भी तरह उतना ही काम कर लेते है दो दिन की मेहनत का मात्र 2 रूपये इतना शोषण कलप-कलप उठता मेरा मन काश मैं मिसेज दामोलकर से मिल पाती उन्हे दिखलाती कि मजदूरी महंगी हो जाने के कारण दर-दर भटकते इन बच्चों पर क्या गुजर रही है। जरा से पैसो के लालच में अपनी शक्ति से कितना अधिक करने का प्रयास है इनका और काम करने में सफल भी है।
     लाल दवा लगाकर सहानुभूति से मैंने कहा लो इससे ठीक हो जायेगा?। कभी जरूरत हो तो यहीं आ जाना और वे उछलते कूदते चले गये।
     उस दिन कालेज मे ही पता चला था बाल मजदूर नवजागरण पर मिसेज दामोलकर का भाषण निकट के मैदान में होने वाला है। अन्तिम दो पीरियड न होने के कारण मैं उनका भाषण सुनने का मोह न छोड़ सकी काफी भीड़ थी बड़ा जोरदार भाषण रहा। मैं उनके बोलने के ढंग पर मुग्ध थी कितनी सटीक, भावपूर्ण सहज और मार्मिक उक्तियाँ  थी मंच से उतरते ही सबने उन्हें घेर लिया बड़े प्यार से दुलारते सहलाते वे एक देवी सी लग रही थी। मेरा मन श्रद्धा से झुक गया। निश्चय किया अपने घर के सामने होने वाली घटना से मै उन्हें अवश्य परिचत करवाउंगी   इनसे जरूर मिलवौंगी  जहां  ये शोषण हो रहा है संसार में कितने तरह के लोग है कहाँ ये दामेलकर, और कहाँ वह कठोर निर्दयी निष्ठुर भावहीन इमारत वाली महिला दोनों ही अलग म्गजतमउम पर।
     भाषण के प्रभाव से डूबता उतराता मेरा युवा मन कुछ कर गुजरने को ब्याकुल हो उठा रात भर उन्हीं कल्पनाओं में खोयी रही। सोचा पहले 9 बजे जाकर बच्चों के साथ उन महिला से मिलूँगी तब दामेलकर को लेकर जाऊँगी । वे जरूर मेरे आयेगी करूणामय, बच्चों के लिये तो उनका रोम-रोम विह्वल है।
     सुबह का मुझे बेसब्री से इन्तजार था बाल मण्डली आ जुटी थी आज उनकी संख्या ज्यादा थी धीरे-धीरे मैं उस इमारत की ओर बढ़ रही थी। दूर से एक मध्यम कद, की, सिल्क  की प्रिंटेड साडी  दिखाई पड़ रही थी चेहरा साफ नहीं था डाटने की काम न करने की किसी बात पर जोर-जोर से बिगड़ रही थी, ‘‘अगर इतने ईट उठाकर ठीक से नहीं रखे गये जगह पूरी साफ न हुई तो कल के पैसे भी नहीं दूंगी न जाने कहाँ से चले आते हैं ये छोकरे, नालायक कहीं के’’ मेरी ऑंखें  उन बच्चों को खोज रही थी मगर वे दिखाई न पड़ रहे थे निकट पहुँच  कर पीछे से क्रोध और आक्रोश से लगभग चीखकर मैने कहा सुनिये मैडम -- क्या अपने इन बच्चों को काम पर लगाया है--- वह अचानक घूमी - ‘‘क्यों क्या बात है? आपको क्या तकलीफ है? रूक्ष और झुंझलाये स्वर मे उन्होंने घूमकर कहा-
    मेरा मुख आश्चर्य से खुला रह गया आवाक- - - कल की भाषण देने वाली मिसेज दामेलकर , मेरी आदर्श - - -हाँ  बिल्कुल वहीं - - - वही- - - चेहरा - - - आप --? हकलाते हुए मेरे आगे शब्द मुँह  में ही रह गये क्या क्या हुआ? क्या चाहिये।
    मेरा सारा जोश ठंडा पड़ चुका था जी मेरे मन की अमोल प्रतिमा खण्डित हो चुकी थी कुछ नहीं - -- सारी धीमी गति से मैं लौट पड़ी सोच रहीं थी मिसेज दामेलकर का कौन सा रूप सही है वह कि यह---?

Sunday, February 17, 2013

Atma Chintan

                                             आत्म चिन्तन
                               गुरू ब्रम्हा , गुरूःविष्णु गुर्रूदेवो महेश्वरः
                               गुरूः साक्षात परमब्रहम् तस्मै श्री गुरूवे नमः।।
गुरू  है, गुरू ब्रम्हा विष्णु है गुरू सब देवों के देव महेश्वर हैं वास्तव में गुरू साक्षात परमब्रहम् है इसलिए गुरू को नमस्कार है।
     भारतीय दर्शन और संस्कृति में जो गौरव गुरू को प्रदान कियया गया है वह अन्यत्र कहीं नहीं। अन्धकार से प्रकाश की ओर अज्ञान से ज्ञान की ओर असत से सत की ओर अग्रसर कराने वाला गुरू ही है। ज्ञान की शलाका से मनुष्य की बन्द आंख  को खोलता है। विवके, चेतना को जगता है। आत्म चिन्तन, आत्ममंथन की प्रक्रिया द्वारा अपनी उन्नति के उपाय को बताकर लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रेरित करने वाला गुरू ही है।
      शिक्षक के पद पर आते ही वह मनुष्य सामान्य से विशेष हो उठता है। ईश्वर और परमब्रहम् स्वरूप हो जाता है। युग बदल देने का अदम्य साहस और शक्ति गुरू के पास ही है। नये स्वच्छ, स्वस्थ विचारों वाले समाज का सजकि, निर्माता, प्राणदाता सृष्टि कर्ता हो उठता है शिक्षक।। और आज का छात्र कल के नागरिक, समाज की इकाईयों को शिक्षको का व्यक्तित्व प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं गहरा प्रभावित करता है।
      आइये, आज हम सब अपने-अपने गुरूओं का स्मरण करें, उनके प्रति श्रद्धा से नत मस्तक हो जिन्होंने हमारे जीवन को, किसी भी क्षेत्र में स्पर्श किया हो, जिन्होंने अपने ज्ञान, प्रेरणा और लगन से हमको शिक्षक के पड़ाव तक पहुंचाया  है इस योग्य बनाया है कि हम शिक्षक के पद पर आयें है। उत्तर दायित्व कठिन है मार्ग दुर्गम है। तप का है, साधना का है। पग-पग पर सावधानी अपेक्षित है। हमें अपने चरित्र पर सतत नजर रखनी हैं क्योकि छात्र अनुकरणशील है।

Sunday, February 3, 2013

Naitikta Ka Path

                                क्या नैतिकता का पाठ जरूरी है?
    कई बार सोचा है। सोचती ही रह गई  हूँ कि हम आज बच्चों के जीवन की नींव ईमानदारी, कर्मठता, परिश्रम, धार्मिकता,मानवता, नैतिकता, पर रखने  का प्रयास कर रहे है। यह सच भी है, कि प्रत्येक माता-पित के इस पक्ष के प्रति जागरूक रहने के कारण सफल भी होंगे। पर इन्हीं दृढ़ संस्कारों में पला बालक जब बड़ा होकर अपनी इसी मानवता के नैतिक मूल्यों की अमूल्य पूंजी लेकर जीवन के वास्तविक कर्म क्षेत्र में पहूँचता है, तो वह दुविधा में पड़ा सोचता रह जाता है, कि वह किस शक्ति को लेकर भटक रहा है-चाहे वह शिक्षा हो, नौकरी हो, व्यापार हो अथवा जीवन-यापन का कोई अन्य साधन। यही आदर्श उसे दर-दर का भिखारी बना देते है। जगह-जगह प्रताड़ना मिलती है उसको, उसकी ईमानदारी की, उसके उसूलों के पक्के होन की और या यूं कहिये उसकी मूर्खता की।
    जो बेईमानी से, धोखे से, चापलूसी से, इधर-उधर की वाचालता, सच्चे-झूठे आरोप लगा कर, कालाबाजारी कर जीवन के उच्चतम शिखर पर पहूँच कर इतराता, विजय के क्षणों में समाज के सभी सुखों मान-सम्मान का उपभोग करते हुए न जाने कितनी आने वाली अपनी पीढि़यों के लिये सुन्दर भविष्य की स्थापना करता है,वही सफल है। इसके विपरीत ईमानदारी और सच्चाई की पोटली पकडे़ वह रास्ते की की ठोकरें खाता है। निराशा के क्षणों में दोषारोपण करता है, अपने उन आदर्श माता-पिता पर, जिन्होंने समय, समाज के साथ उसमें चलती नीतियों के अनुरूप चल सकने की शिक्षा नहीं दिलाई। वे सतयुग के लिये तैयार करते रहे इस कलयुग में!
     यदि निराशा और असफलता के क्षणों में वह अपने ढांढस बंधाता है, यह कह कर कि जो बेईमानी, धोखाधड़ी, आन्याय करता है, दूसरों का गला काट कर आगे बढ़ता है, वह बाहय् रूप से अवश्य सुखी लगता है मगर उसे अपने किये का फल अवश्य भोगना पड़ता है, भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं। उसको उसका फल मिलेगा ही। हो सकता है जीवन के अंतिम क्षणों में अनीतियों को अपनाने वाला क्षुब्ध हो, दुखी हो, लेकिन उससे क्या? उसने सारा जीवन तो ऐश-आराम भोगा परिवार ने सुख भोगा, समाज में इज्जत मिली, उसके सात खून भी माफ। उसके खिलाफ समाज में दबी जबान में कुछ अंगुलियां जरूर उठेंगी, मगर धन और पद की विशाल छाया में मुरझा जायेंगी।
     इसके दूसरे पक्ष में यह कहा जा सकता है, कि ईमानदारी, कर्मठता, मानवता की राह पर चलते हुए भी लोग सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचे है! म्गर कितने? कितना प्रतिशत है उनका? नगण्य!
     आत्मिक संतोष और आदर्शों को पालन करते रहने की गर्वानुभूति की बात कह कर भी इस पक्ष की उपयोगिता और महत्व पर प्रकाश डाला जा सकता है। ठीक है। परन्तु मनुष्य केवल आदर्श और आत्मिक संतोष पर ही तो जीवित नहीं रह सकता है, उसको चाहिए जीवन-यापन के लिये धन, समाज में मान-सम्मान और अपने बच्चों का सुन्दर भविष्य।
     यह नौकरी, व्यापार, शिक्षा, प्राइवेट फर्म में काम करने वाले लोगों में, मेहनत, नैतिकता और मानवता को तिलांजलि देकर क्या-क्या हथकंडे, एक दूसरे को नीचा गिरा कर काट कर आगे बढ़ने के लिये अपनाये जाते है, सभी जानते है।
     क्या हाल है इसका? क्यों न फिर मनुष्य को जीवन के व्यावहारिक क्षेत्र में आनेवाले राजनीति, धोखाधड़ी  अन्याय और षड्यंत्र तथा अनीतियों से भी परिचित कराया जाय, उसके संभावित समाधानों से अवगत कराया जाय, ताकि समय आने पर वह अपनी जीविका, मान-सम्मान तथा पद की रक्षा करने में सफल हो सके।    

Sunday, January 27, 2013

Aaj Aur Hum

आज और हम
    कहा जाता है कि, ईष्वर की सबसे सुन्दर श्रेष्ठ बुद्धिमान और विवेकी रचना है मनुष्य और यह भी सच है कि जरूरतें नये-नये आविष्कारों को जन्म देती हैं। परिवर्तन जीवन है सुख सुविधाओं का आकांक्षी मनुष्य लगातार नई-नई चीजे बना रहा है और स्वयं को वैज्ञानिक, प्रगतिवादी सिद्ध करता ही जा रहा है लेकिन यह सुविधाभोगी मानसिकता उपभोगवाद या सिद्धांत क्या वास्तव में हमें सही दिशा की ओर ले जा रहा है? इस सुविधभोगी उपभोगवाद ने हमें हमारे समाज को किस पतन की ओर ढ़केल दिया है-आइये देखे और समझे कि यह कैसे हमारी सुन्दर संस्कृति को अपसंस्कृति में, सोच को विकृत मानसिकता में बदल रहा है और दीमक की तरह जीवन को खोखला करता जा रहा है।
      निरन्तर नये-नये आविष्कार गाड़ी, मोबाइल, कार लैपटाप, भोजन मे पीजा बरगर, डिब्बाबन्द भोजन के नये-नये पकार, शारीरिक श्रम व समय को बचानें के लिये वाशिंग मशीन, मिक्सी आदि उपकरण जहाॅं एक ओर हमारी शक्ति और समय बचाते है वही दूसरी ओर बचाई गई शक्ति और समय से क्या हम अपना और प्रकृति दत्त सुविधाओं से तालमेल बैठा पा रहे है? नही....प्रकृति के दोहन से हम उससे दूर ही होते जा रहे है। हम आज सुविधावादी भोगवाद में आकंठ डूब गये है। इसने कितनी मानसिक विकरों इष्र्या द्वेष, लूट पाट, आदि को बढ़ावा दे दिया है नतीजा है कि हमारा नजरिया ही बदल गया है।
       अगर सुविधा लेना और पाना ही हमारी इच्छा है आराम हमारा उद्देश्य है तो समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान का मापदण्ड महंगी गाडि़याॅं, धन सम्पत्ति, महगे मोबाइल आधिक से अधिक क्यों चाहने लगा है व्यक्ति एक सामान्य सा मोबाइल सुविधा और आवश्यकता दोनो ही पूरा कर सकता है फिर वह ब्लैकबेरी की ओर क्यों भाग रहा है। एक से संतुष्ट क्यांे नहीं? एक गाड़ी की जगह चार गाड़ियाँ, एक की जगह फोन को निरन्तर बदलते रहने की ललक और प्रदर्शन चाहे उसकी जरूरत हो या न हो। क्यों लगातार है कि यदि उसके पास अधिक से अधिक महंगे उपकरण, महंगी जीवन शैली पैसे से स्वयं को श्रेष्ठ प्रतिष्ठित होने को गर्व की अनुभूति। बस यही है आज के सामाजिक जीवन का आधार। आजा का सामाजिक जीवन मध्य वर्ग और उच्च वर्ग की मानसिकता और फिर ऐसा करने में वह आस- पास से कट कर अकेला भावनात्मक रूप से टूटता ही क्यों न जाय? इस बात से भी इनकर नहीं किया जा सकता कि यह असंतुलन केवल 20-25 प्रतिशत लोगों की है लेकिन उनका प्रयोग इतनी अधिक मात्रा में है कि सामान्य 80 प्रतिशत भी उससे प्रभावित होता है और वैश्विक स्तर पर छा जाता है।
      क्यों हो रहे है इतने अपराध! क्यों बिगड़ रहे है बच्चे क्यों परेशान है माता पिता परिवार! असुरक्षा का भय, भविष्य की चिन्ता और अधिक से अधिक धन बटोर लेनी की जुगत। सुख-चैन आत्म हत्यायें, तनाव न सहन करने के कारण, इसी भौतिकवाद से उत्पन्न प्रभाव है जिनके मकड़ जाल में फॅंसा मनुष्य न स्वयं जी रहा है और न दूसरों को जीने दे रहा है। छटपटा कर जब निकलना चाहता है तो कोई रास्ता नहीं दिखता।
      न कोई विज्ञापन, न कोइ सलाह! इस उपभोगतावाद के वर्तमान स्वरूप में अमूल्य परिवर्तन नही किया जा सकता क्योंकि यह मनुष्य के स्वभाव पर आधारित और जुड़ी हुई। हाँ  इतना जरूर है कि आत्म-अवलोकन से स्वयम को समझाते हुए इसे कम जरूर किया जा सकता है। व्यक्तिगत प्रयास ही कारगर होगा।

Subh Sanket



    शुभ  संकेत

   हम लौट रहे है हाँ  -अपनी जमीं अपनी संस्कृति और दर्शन ने हमें वापस बुला लिया है। भौतिकता की तेज रफ्तार सोच ने हमारे मन मस्तिष्क को ऐसा छा लिया था कि हम भ्रमित और सशंकित थे। भयभीत थे। समय का पहिया घूम रहा है। अपनी पुरानी संस्कृति और विचारों को तर्क बुद्धि और व्यवहारिकता की कसौटी पर खरा उतर कर अपनी सत्यता को प्रमाणित कर दिया है। विचार प्रभावित करने लगे है। वातावरण चाहे सामाजिक हो आर्थिक हो या राजनैतिक जागरूकता की लहर दौड़ पड़ी है। भौतिकता दिखावा धन दौलत वैभव को चमक-दमक  फीकी पड़ने लगी है एक वर्ग या समूह ऐसा विकसित हो रहा है जो सोच रहा है सम-हजय रहा है उसे दिन प्रतिदिन के जीवन में व्यवहार में उतार रहा है पाप का घड़ा अब भर गया है फूटने को है। वह अपनी चरम पर है जहा से प्रत्यावर्तन होता है। अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर पहुचने वाला भ्रष्टाचार का सच्चा रूप सामने खुल पड़ा है शर्म को भी शरमिन्दा कर इस भ्रष्ट आचरण ने सबकी नही तो कुछ लोगों की आखें जरूर खोल दी है। सच ही तो कहा गया था भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती। कब किस अन्याय का फल किसके सिसकियों की आह किसरूप में कहर बरसाये किसी को पता नहीं हैं।

     कितनी अनहोनी घटनाये किसका फल है किसी को पता नही है। तन, मन, घन से शान्ति के लिये भटकते मन अकेले पड़ कर उन रहस्यों का परदा हटाने में लगा है कर्म काण्डों को हटा कर मूलभावना, विचार को समझ करमूल शिक्षा को अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर रहा है यह एक शुभ संकेत है हम लौट रहे है अपनी सभ्यता और संस्कृति की गरिमा की ओर जमीं से जुड़ने के लिये।    

Sunday, January 13, 2013

main bada ho gaya huin papa



                                                           ‘‘मै बड़ा हो गया हूँ   पापा’’

              

               जैसे-जैसे मैट्रिक  की परीक्षाफल का समय निकट आ रहा था मैं राहुल के व्यवहार में एक अजीब सा   उलझन   भरा परिवर्तन देख रही थी। अल्हड़, बिन्दास, चंचल राहुल अचानक ही कभी गम्भीर बुजुर्ग का सा आवरणओढ़   लेता और ऐसी बड़ी-बड़ी बातें करता जैसे घर का बड़ा बूढा  हो और कभी चंचल सबसे छोटा चुलबुल स्कूल का शोख लड़का। दोनों का मिश्रण, मानो चैराहे पर खड़ा किस ओर जायें की   उलझन     । उन्मुक्त आकाश में पंख फड़फड़ा कर उड़ने के लिये तैयार।अशक्त होते हुए भी अदम्य साहस और शक्ति से भरा होने का आत्मविश्वास। एक ही उड़ान में सारे आकाश को नाप लेने का सपना।

                  जिस दिन आखिरी परचा था। आते ही कमरे में कापी किताब मुझमे बें एक ओर फेंकते हुए जोर से कहा था-‘‘मेहनत  मैं कर सकता था मा  मैन किया अब क्या डिवीज़न  आयेगा मैं नही जानता। लेकिन यह जरूर जानता हूँ कि आई हैव done my best .  इससे ज्यादा की capacity मुझमें  नहीं है’’।

                  अब अक्सर मैं देखती हूँ  सब कुछ शान्त है पंखा छत पर अबाध गति से अनवरत चल रहा है और एकटक उस ओर देखता राहुल न मालूम किन सपनों में खोया है। शायद दिवा स्वप्नों का सुनहला संसार  आँखों     में रच बस रहहै। कहानी की, मैगजीन का कोई पन्ना  के सामने खुला है औधे मुँह     लेटा है पैर धीरे-धीरे हिलाता नाखूनों को दातों से कुतरता न मालूम क्या गुन सुन रहा है। आखें जरूर मैगजीन पर है पर मन कहीं और।

                  दूसरी ही दुनिया में खोया सा लगता है। 15-16 वर्ष की आयु। शुरू से ही साथ रहा है, अपने से अलग करने का कभी मौका भी तो नहीं लगा। एक साल बड़ी बहन कान्ता। वही साथी, सहेली, बहन, लड़ाई-झगड़ा  प्यारदुलार, मान-मनुहार सब कुछ एक दूसरे से ही। कभी कुछ और आवश्यकता संगी साथियों की महसूस ही नहीं, हुई शायद। मम्मी पापा दोनों से ही मित्र की तरह खुलापन और स्नेह। राहुल के पापा भी इस परिवर्तन को महसूस कर रहे हैं। गुमसुम सा राहुल कुछ चुपचुप कुछ गम्भीर। इसे कहीं बाहर घूमने के लिये भेज देना चाहिये। तीन महीने के बाद रिजल्ट निकलेगा। कुछ न करने से तो एकदम dull हो जायेगा। यही ।हम ठीक है बाहरी रिश्तेदारों,भाई बहनों से मिल आयेगा। कुछ न कुछ सीखेगा ही बींदहम हो जायेगा क्यों न बम्बई और दिल्ली अपने चाचा तथा जीजी के पास हो आवें और राहुल ने भी कोई उज्र नहीं किया।

                   2 महीने क अन्तराल के बाद राहुल आया तो मुझे  बड़ा बदला-बदला सा लगा। कुछ बड़ा-बड़ा सा। शायदवहाँ  रहकर उसने किन्हीं मन के व्याकुल क्षणों में ओठों के उपर उग आये कोमल बालों को कैंची से काट कर चिकना करने की कोशिश की हो और साफ होने के बजाय काले धने बालों के जंगल से उग आये थेमसें भीगने लगी थी। एक अजीब सा लावण्य आ गया था चेहरे पर नमकीन, सलोना, भोला, कुछ -     झिझका , कुछ ठिठका, हाथ की कलाइयाँ गोलगोल होने लगी थी। पीठ के पुट्ठों में मासंलता के कारण बदन भरने  सा लगा था। चैड़े कन्धे, मानो धीरे-धीरे एक आदमकद विकसित पुरूष का व्यक्तित्व प्रस्फुटित हो रहा था।

                   कितना सुखद लगता है बच्चों का बड़ा होना, अच्छे व्यक्तित्व में उभरता, समझदार  , सहिष्णु और जागरूक बनना। मानो वह अपने पापा का ही प्रतिरूप हो उठा था। चाल ढाल       उठना  बैठना            सब   पा कुछ  पापा      जैसा  बार बार न्यौछावर हो उठता है मन     साथ ही साथ यह भी अहसास दिला जाता है कि समय कितनी तेजी से बीत     रहा है या  कहें भाग रहा है। एक की आखों के सामने उगता सूरज है, उज्वल भविष्य का सपना है, उन्मुक्त प्रशस्त मार्ग है, और दूसरी ओर गहरा अवसाद स्वयं माता पिता के बूढ़े

                   राहुल ने करवट बदल कर बिस्तरे पर लेटे-लेटे  ही देखा अब चारों ओर का यह बदरंग कमरा उसे रंगों से भरा सुन्दर एवं आकर्शक लगने लगा है। अबकी जब से वह चाचा और जीजा के पास से तीन माह के लगभग रह कर लौटा है उसे सारा घर ही बदला-बदला लग रहा है। मम्मी पापा सब में कुछ बदलाव है कहीं उसमें स्वयं अपने में कोई बदलाव तो नहीं आ रहा है? अब वह मम्मी की पुकार  पर पहले की तरह   चिल्ला नहीं उठता, चीख कर जवाब क्यूँ  नही देता? अब उसे कयों लगने लगा है कि उसका अपना व्यक्तित्व है, स्थान है, व्यक्तिगत अहम् है। अब उसे फ्रिज से समान निकाल चुराकर चुपचाप खा लेने अकेलेअकेले में मजा नहीं आता। अब अपने बहन से छोटे-बड़े आम के लिए घण्टों झगड़ा करने का मन नहीं करता। कापी, पेन्सिल, खीर, मिठाई, टाफी, चाकलेट हर चीज के बटवारे में कितना रो-धोकर

झ गड़ा कर यहा तक की मारपीट की भी नौबत आ जाती थी। कुछ भी काम बराबरी के हिस्का-हिस्की से ही होता था कलम, पेन्सिल, रबर पर भी घण्टों बहस हो जाया करती थी मैंने क्या किया और कान्ता ने क्या किया? इसकी फेहरिस्त बनती थी निर्णय के लिये पापा के पास रखी जाती थी। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता था किझगड़ा -        न हो। पापा कहते यह क्या मैं जब भी आफिस से लौटता हॅ लगता झगड़े       घरमें  आ गयाहूँ  अब तुम लोग बड़े हो रहे हो। ये दिन लौट कर नहीं आयेंगे। माँ  बाप को समझ ने  बू झने  की, मदत  करने की यही सबसे अच्छी       उमर  है। भाई बहन के प्रेम  की यह इमेज हम है हर पल, हर क्षण को      अन्जोय  करो।  कुछ  दिनों       के बाद तुम लोग अलग-अलग चले जाओगे। बहुत रोओगे        बहुत       मिस  करोगे एक दूसरे को।

                    और   हाँ सच ही तो मेरा मन कान्ता से लडने  झगड़ने को नहीं करता अब मैं कामों  की फेहरिस्त बना कर बा टना नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ , मैं कुछ करूं  सबके लिये। जैसे पापा करते हैं सबके लिये। मैं कुछ करता चाहता हूँ । जब  सिनेमाँ    में    किसी भाई को देखता हूँ  किसी बेटे को देखता हूँ    तो मेरा   रूयाँ -  रोयाँ भी व्याकुल हो उठता है मैं कुछ अच्छा कर सकूं । मै बड़ा हो गया हूँ ।  कार      चलाते समय पापा की सीट पर बैठते ही मुझे  लगता है मुझे  भी पापा की तरह बनना है कुछ प्राप्त करना है। मैं जरूर बड़ा हो गया हूँ धरती से आकाश को नाप सकने योग्य।