Sunday, December 15, 2013

VIWASHTA


                                                                      विवशता
       क्या करूँ रानी! सिनेमा की रील की तरह बचपन से अब तक की यादें मुझसे लिपट-लिपट कर मुझे मरने नही देती। बीच-बीच में आप लोगों का समय निकाल कर आजाना, मिलना मेरी उम्र को और भी बढ़ा जाता है। शुभकामनाये तो हरदम आपके साथ है 90 की उम्र। हाथ-पैर चलता रहें किसी के अधीन होकर निर्भर न होना पड़े रानी। बस कब जाना होगा यही सोच-सोच कर हैरान हूँ। कितनी लम्बी उमर लेकर आई हूँ। कौन-सा बड़ा काम बचा है? जिसके लिये भगवान ने रोक रखा है। यही सोचती हूँ। सफेद सन् जैसा कोमल चमकीले बाल अस्त-व्यस्त, इधर-उधर झूलते फैले रहते इसीलिये अबकी बार बहू और बेटियों ने मिलकर, समझा कर बाल कटवा दिये। इन्दिरा गाँधी नहीं-नही शीला दीक्षित मुख्यमंत्री दिल्ली की तरह। इस उम्र में भी भारत की राजधानी दिल्ली की मुख्यमंत्री की तरह कार्य कुशल, संवेदनशील, भव्य साफ-सुथरा चेहरा अनुभवों से दमकता। झुर्रियाँ तो चेहरे पर नही है मगर कमर कमान की तरह झुक गई है सोच और उमंग में वही नयापन। हर पल, समय के साथ बदलने की चाह। किसी भी भाव घटना की तह तक जाकर तर्क- वितर्क समझाने में निपुणता अभी भी वही पुरानी है शरीर थक चला है मगर कल्पनाओं के पंखों के सहारे कहाँ- कहाँ तक घूम आता है मन।
      मैने और मेरी बड़ी बहन जो कलकत्ता से आई है बिना किसी पूर्व सूचना ज्ञानपुर में रहने वाली नानी माँ को आश्चर्य चकित कर देने की इच्छा से अचानक पहुँच कर उन्हे अचम्भित कर देने की ठानी। बचपन का वह नटखटपन मानो हम दोनों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। बड़ा मजा आयेगा। नानी माँ अचानक ही अपने सामने पाकर कया रिएक्ट करेंगी देखने के लिये मन मचल उठा था। हम फिर से बच्चे बन गये थे। बस की दो घण्टे की यात्रा बचपन की बातो, घटनाओं को याद करते दोहराते बतियाते कितनी जल्दी बीत गई कुछ पता ही नही चला।
      कन्डक्टर ने चिल्लाकर याद दिलाया ज्ञानपुर-- ज्ञानपुर--3 कौन उतरने वाले है जल्दी करें। हड़बड़ा कर ड्राइवर, और दूसरे यात्रीगण पीछे मुड़ कर देखने लगें। घबड़ा कर अपने-अपने झोले पकड़े हम एकदूसरे का हाथ पकड़े उतर पड़े। शाम को तो वापस लौटना ही है इसलिये छोटे-छोटे झोले ही काफी थे। 75 वर्ष की बड़ी बहन और अड़सठ वर्षीय मैं एक दूसरे का हाथ इस तरह कस कर पकड़े थे कि कहीं बिछड़ न जायें बस से उतर कर। उम्र का भारीपन असुरझा की भावना को किस कदर बढ़ा देता है यह उसी पल महसूस हुआ।
  घर तक पैदल ही चलना था। मेन रोड से दो फर्लांग। ओह! पाँच वर्षों के बाद आ रहे है नानी घर। कुछ भी तो नहीं बदला। सब कुछ वैसा ही बातो का जो दौर चला तो नानी माँ की आँखों में चमक आ गई। हँसते-गुनगुनाते कभी चुपचाप सोचने से लगती, कभी आँखें नम हो जाती कभी प्यार से सराबोर, कभी उदास कभी खुश कभी खिलखिला पड़ती। 32 वर्ष की आयु से ही वैधव्य की मार झेलती अपनी माँकीसीखों को याद कर, उनका पालन करते हुये जीवन के इस मोड़ पर आ पहुँची थी नानी माँ।
     जानती है रानी! जिस साल आपका जन्म हुआ उसी साल व्याह कर आई थी इस घर में। बहू का आगमन, स्वगत सब लोग हँसते गाते ढ़ोलकक बजाते-नाचते है मगर जब मैं अपने पति को दरवाजे पर उतरी तो हर आँखें रो रही थी। आँखे पोछते सिसकते जेठानी, सास, ददिया सास ने  परछन किया। मैं दूसरी पत्नी थी पहली जनी को मरे बस सिर्फ छः महीने ही हुये थे। बच्चे को जन्म देते समय मर गई थी बेचारी दस साल तक रहा था वैवाहिक जीवन। उन्ही का सिन्धौरा मिला था मुझे। सौत थी मै उनकी। क्या करती। माँने समझाया था- बेटी बिना बाप की हो तुम्हारे ताया शादी कर रहे है। अब यही समझना- वही तुम्हारा घर है। हर तरह से प्यार ही तुम्हे पाना है। ससुराल से झगड़ा कर कभी न आना तुम खुश रखोगी सब तुम्हे अपना लेगें। मै दीन-हीन विधवा तुम्हारी माँ कोई भी सहायता न कर पाऊँगी’’। माँ परिवार की विवशता और किसी अनजाने के हाथों में सौंपते माँकी वे आँखें मुझे आजभी याद है। बहते आँसुओं की धारा मेरे विवाह के अरमान सब बह गये। पति के पहली रात को कहें गये वचन आज तक मेरी कानों में गूँजते रहतें है’’ मैं तो वैरागी हो गया हूँ राधा पहली को कभी न भुला पाऊँगा। बस परिवार के लिये ही शादी की है घर के लोगों को खुश रखना खाना कपड़ा लत्ता किसी प्रकार की कमी न होगी। राधा। बस मेरी प्यार की आशा न करना मैं विंदास परिवार बच्चों के बन्धन में नहीं बधना चाहता। और फिर बस एक ही लक्ष्य पति का प्यार पाना और परिवार को खुश रखना बन गया मेरा लक्ष्य। माँ का चिरौरी करता चेहरा और विवशता बार-बार किसी भी प्रकार के अत्याचार का विरोध करने से रोकता। अपने प्रिय उपन्यासकार शरतचन्द की उपन्यासों की नायिका की तरह मैं भी बन जाऊँगी ऐसा तो कभी सोचा ही न था तुम्हारी नानी ने।
     मगर रानी! भाग्य का लिखा न तो कोई मिटा सकता है और ना ही अपने आँचल से ज्यादा कोई पा सकता है। उत्तरदायित्वों से अनजान, निरीह और भावुक व्यक्ति के अपरिपक्व निर्णयों का खामियाजा भुगतते कितने वर्ष बीत गयें। बेटा सन्तोष और बेटी आये थे परिवार बढ़ा लेकिन असफलताओं का सेहरा मुझे ही बाँधा गया। दुख के थपेड़े सहते आँखों के आँसू सूख गये।
     अपनी जिद क्रोध और असहयोग को हथियार बना कर बेटा तड़पता इस दुनियाँ से चला गया और अपरिपक्व, मस्तिष्क से कमजोर बेटी आज भी जीने को अभिशप्त है। कौन देखोगा उसे। सम्भालेगा उसे अपने आँखों के सामने ही उसे भी विदा करदूँ तो मानो सब उत्तरदायित्व पूरे कर लिये। इस जनम में तो मैने कुछ बुरा नहीं किया ये जरूर पिछले जन्म का ही कुछ लेन-देन है जिसे मैं चुका रही हूँ रानी! बस शायद यही काम छूट रहा है इसी में जान अटकी है बाकी सब हरि की इच्छा!
       क्या खायेगी रानी? मायके आई है दालभरी पराठा और खीर। बहुत पसन्द है न आपको। सब कुछ सहज सामान्य कोई इन्सान ऐसा होता है? नहीं ये तो भगवान का ही कोई निराला रूप है? या स्वयं भगवान?

Sunday, December 8, 2013

MAIM JI


                                                                 मैम जी
      कक्षा अष्टम वर्ग के साठ बच्चो में से एक छात्र ने न जाने क्यों कब और कैसे अपने ओर मेरा ध्यान आकृष्ट कर लिया था बहुत सोचने पर भी मुझे कोई कारण समझ में न आता। सामान्य कद का गोरा रंग न मोटा न लतला परन्तु शैतानी से चमकती मटकती आँखें और होठों पर मन्द मोहक सी मुस्कारन कक्षा में प्रवेश करते ही मैम जी, मैम जी आज आपने जो निबन्ध लिखवाने को कहा था मैने लिखा है देखिये ना मैम जी। टेबल पर मेरे पहँचने से पहले ही वह वहाँ खड़ा रहता। हर वाक्य के आगे मैम जी, पीछे मैम जी। बड़ा अजीब सा अनोखा व्यवहार लगता मुझे मगर फिर मन को कही अच्छा जरूर लगता। हर समय सहायता को तत्पर। मेरे लिये सबसे लड़ने को तैयार। काम में चुस्त-दुरूस्त। कुल मिला कर मनमोहक व्यक्तित्व। प्रतिदिन कक्षा मुझे उसके उपस्थिति की आदत सी पड़ गयी थी। अनुशासन के लिये सबको समझाता और हर एक की छुपी-छुपी शैतानियों व हरकतों से मुझे अवगत कराता।
     मैम जी! अजय हिन्दी की कापी डेस्क पर रख कर नीचे गोद में केमिस्ट्री की किताब मैम जी देखिये-देखिये और मैं जोर से पुकार उठती अजय! और वह सकपका कर खड़ा हो जाता क्या कर रहे हों? नो नो मैम कुछ नही हिन्दी मुहावरे याद कर रहा हूँ । केमिस्ट्री कौन पढ़ रहा है? किताब लेकर आओ। और मैम जी को रिपार्ट करने वाला लड़का गंभीर मुद्रा में अपनी किताब में आँखे गड़ाये-------कोई पकड़ ही नही सकता कि यही है वह मैम जी कहने वाला --
      इधर हफ्ता दस दिन से वह क्यों नहीं आ रहा था? बार-बार उसकी छवि आँखों के सामने घूम जाती। बहुत दिनों के बाद पता चला वह मेधावी छात्र ‘राधव’ इलाहाबाद के अनाथाश्रम स्वराज भवन से आता था। अनाथ बच्चा! पढ़ने में अच्छा। किसी ने अडाप्ट कर लिया था। इतना बड़ा। उड़ती खबर मिली थी शहर के नामी वकील का दत्तक पुत्र पागल, भोला, अल्हड़ ‘राघव’ दो साल बाद इसी स्कूल के छात्रावास में नये रूप रंग में राघव को देख कर मैं आश्चर्य चकित रह गई।
      भोलेपन की जगह लेती थी परिपक्वता ने, सरलता बदल चुकी थी गम्भीरता में, चुलबुलापन परिपक्वता में। हल्की हल्की मूँछे, सुडौल होती आकृति गाल भर आये थे। पुष्ट और मांसलता की ओर बढ़ता शरीर, रंग और निखार आया था आत्मविश्वासी, आँखो डाल कर निर्भीक बाते करने का लहजा उसे कुछ विशिष्ट बना रहा था।
        दो साल के अन्तराल के बाद विद्यालय के छात्रावास में उसका आगमन। चर्चा का विषय बना ‘राधव’ कक्षा-10 के फाइनल इयर में अडमिशन लिया था उसने। कहाँ रहा इतने दिन।
         स्टाफ रूम के बाहर खड़ा मेरे बाहर आने का इन्तजार करता हुआ। अरे राधव? कहाँ रहे इतने दिन। कितना बदल गये हो? एक साथ ही इतने सारे मेरे सवालो से घिर कर वह चुपचाप मुझे देखता रहा बोला कुछ भी नहीं। चुप बस चुप। अरे कुछ तो बोलो? क्या बोलू? एक संक्षिप्त सा उत्तर! और झुक कर पैर छू लिये उसनेे।
      ऊपर उठाते हुये उसे हृदय से लगा लिया मैने। उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे फिर।जो वाणी न कह सकी  वह आसुओं ने कह दिया। सुख के या दुख के। सुख के ही होंगे शायद। निशब्द सिर झुकाये आँसू गिरते रहे और फिर अचानक ही घूम कर सीढि़यों की ओर मुड़ गया वह 
        अनमने मन से मै लौट आई स्टाफ रूम में। कौन सी घटनाये, स्मृतियाँ और
परिस्थितियाँ किसको कहाँ किस प्रकार ला पटकती है इसे न आज तक कोई जान पाया है और ना ही जान सकेगा। मैं व्यस्त हो गई अपने रोज की दिनचर्या में। अब मेरा कोई भी पीरियड राघव के क्लास में नहीं होता, ना ही मुलाकात होती न ही उसके विषय में कुछ खास पता चलता।
       कब दिन बीत, महीने बीते और फाइनल एग्जाम बोर्ड के आ गये। एक पत्र मेरे टेबल पर पड़ा था?
प्रिय मैम,        
                  आपने कहा था न मै कुछ कहूँ, बोलू, आज मेरे एग्जाम का आखिरी दिन।
मै रिलैक्स्ड महसूस कर रहा हूँ मुझे नया घर, मेरे पापा मेरी मम्मी, मुझे मिली। अनाथाश्रम की अधेरी गन्दी बदबूदार कोठरी से निकाल कर मैं आ गया श्री अरविन्द कुमार एडवोकेट के विशाल कोठीनुमा बंगले   में सब कुछ सपने सा लग रहा था। क्या ईश्वर मुझपर इतना मेहरबान होगा क्या मेरे जीवन में भी खुशियाँ आयेगी। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। दो साल लग गये समझने और संभलने में। बड़े अच्छे लोग हैं एक बहन और एक भाई। माँ और पापा जिन्हें मैं अंकल और आन्टी कहता हूँ कुछ समय तो लगेगा न मैम जी। मै चाहता हूँ उन्होंने जो उपकार मुझ पर किया है मैं एक अच्छा आज्ञाकारी, और अच्छे नम्बर से पास होकर उनके प्रति अपने आभार को प्रकट करते हुये मम्मी पापा कहूँ। तो ज्यादा अच्छा नहीं रहेगा? मैम जी
मै क्यों आपके करीब अपने आप को महसूस करता हूँ। मेरे लिये प्रार्थना कीजिए, दुआ माँगिये। मैं अपने नये मम्मी पापा के लिये उनके आशा के अनुरूप बन सकूँ वे बहुत अच्छे है मेरे लिये क्या कुछ नहीं किया है? मेरा रोम-रोम ऋणी है मैम जी! मुझे आशीर्वाद दीजिए।
      मेरा मन भर आया। मेरे बच्चे! ईश्वर तुम्हारी सहायता करें। मन ही मन कह कर मै काॅपी करेेक्शन में लग गई।
   
  


MERE CHAMAN, MERE SUMAN



                    मेरे चमन, मेरे सुमन
अलविदा! मेरे चमन, मेरे चमन,
अलविदा! हे बन्धु मेरे, प्रिय स्वजन।
खुश रहें हँसते रहें सब मित्र मेरे
अलविदा! मेरे चमन, मेरे सुमन
               यहीं तक था सफर मेरा
               साथ मेरा स्नेह औ सहयोग मेरा
               आप सब फूले फले आगे बढ़े
               अलविदा! मेरे चमन, मेरे सुमन।
सुबह होगी, शाम होगी
पूर्ववत सब कुछ रहेगा
बस, मगर इक हम न होंगे
अलविदा! मेरे चमन, मेरे सुमन
               मधुर यादों के सहारे ही
               ये दिन बीता करेंगे
               अब न जाने कब मिलेंगे?
               अलविदा! मेरे चमन, मेरे सुमन।
                                                स्नेह चन्द्रा
  

Sunday, October 20, 2013

MAIN AUR MERE BABA DADI



                                                                 मैं और मेरे बाबा, दादी
    मैं बातूनी, बात करने में चटर-पटर, मोटा-छोटा भीम, गनपति बप्पा मौरया, कालिया और बहुत से देख-देख कर मैं सब समझ लेती हँू उन चीजों को बोल कार व्यक्त भी कर लेती हँू। अभी-अभी मैने अपना चैथा जन्मदिन मनाया है। कम्प्यूटर चलाना, टेली शाॅपिंग के लियेे माउस क्लिक करना, हर बटन के बारे में जानकारी मुझे है। गेम खेलना, सी0 डी0 लगाना, गााने सुनना मुझे खूब अच्छा लगता है। कितनी नई-नई बाते, नये वर्ड्स जिनका अर्थ (मीनिंग) तो मुझे मालूम नही मगर जब-तब बोल देती हँू और वह फिट भी बैठ जाता है। अरे, बुद्धु, कही के, स्टुपिड, हमला, नौटी, व्यस्त हँू डिस्टर्ब मत करो, मूड नही है, बत्तमीज दिल, जोे भी टी0 वी0 ने सिखाया और सुनाया है वह मुझे बहुत सही से आते है। गाने में बत्तमीज दिल, चक-चक धूम, चुनरिया मेरी, कोलोविरा-कोलोविरा, पनघट पर छेड़ गयों रे मेरे प्यारे गाने है जिन पर मै नाच सकती हँू
      मगर स्कूल में, पढ़ने लिखने में मेरा मन नही नहीं लगता। बहुत समझाये फुसलाये जाने पर, मम्मी-पापा के कने पर बड़ी मेहनत से थोड़ा बहुत लिख लेती हँू। मगर किसी को जमता नहीं। बारबी डाल से खेलना, बिन्दी लिपिस्टक,  नेलपाॅलिश लगाना सजाना मै बहुत मन लगा कर करती हँू। साइकिल चलाना लूडो खेलना, टीचर-टीचर बन कर खेलना, डाॅक्टर बन सबको देखना मुझे बड़ा ही अच्छा लगाता है छोटी बेबी को नहलाना धुलाना, तैयार करना कमरे को ठीक कर सजाना इन्ज्वाय करती हँू।
       मुझे खूब समझ में आता है कब मुझे कहना मान लेना चाहिए और कब जिद कर अपने मन का काम कराया जा सकता है। मौका पड़ने पर मै जमीन पर लोट भी सकती हँू। थैंक यू और साॅरी कहना मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगता। पता नहीं क्यों? सब लोग मुझे इसके लिये बार-बार टोका करते है। अरे ये लोग कितने अजीब है बच्चों को समझते ही नही। मैं तो अभी छोटी हँू ओनली 4 इर्यस (साल)की।
       मेरे स्कूल की छुट्टी है 5 दिन की हाॅलिडे। बाबा, दादी आ रहे है। मम्मी पापा ने बहुत सी चीजे बताई है। बाबा, दादी के पैर छूने है नमस्ते करना है तंग नही करना है। कहानी सुनना है। अपनी पोयम हिन्दी इग्लिश की सुनाना है। चिल्लाना नहीं है। अपने स्कूल की कापी किताबे दिखाना है गुड गर्ल बनना है। ओह गाॅड! कतनी बाते याद करूँ। याद रहेगा क्या? मुझे ये सब?
       वह दिन भी आ गया। बार-बार यही पूछने से कि टेªन कितनी देर में आयेगी। बाबा दादी कब पहुँचेंगे? परेशान कर दिया मैने! और जब कार उन दोनों को लेकर घर पहुँची तो मैं दौड़ कर सामने के कमरे मे छुप गई। खिड़की से झांक कर देखा मेरा प्यारा डाॅगी पूछ हिलाता पोपेम दौड़ कर पूँछ हिलाता सबसे पहले पहँच गया और कूद-कूद कर खूब प्यार करवाया बाबा दादी से। मै परदे के पीछे से देखती रही।
       ये कैसे बाबा दादी? इतने फरक, अलीशा अनवर केतकी के बाबा, दादी से कितने फरक?(डिफरेन्ट)! गोल मटोल मोटे से बाबा, बाल तो सर पर है ही नही? कहाँ चले गये सारे बाल? मम्मी कहती है जो चाकलेट ज्यादा खाते है वो ऐसे ही मोटे हो जाते है और दादी? मुझे तो असीता की दादी याद है उनसे तो यह कही नही मिलती? सलवार कुर्ते में? स्कूल की टीचर की तरह दादी?
       अरे! गौरी कहाँ है भाई? पापिंस तो आ गया? गौरी कहाँ छिप गई? दादी की आवाज मुझे सुनाई पड़ रही है। मैने अपना स्कूल का बैग उठाया और उनके सामने खड़ी हो गयी। मैने पोनी टेल बनाई है हेयर बैण्ड लगाया है। मम्मी ने कहा है स्मार्ट और स्वीट लग रही हूँ काले सफेद रंग का छोटा सा स्कर्ट ट्यूनिक पहने मै सचमुच प्यारी लग रही हूँ। अरे गौरी! मेरी मीठी कैसी है? दादी की मीठी’’ पैर छूना तो मै भूल ही गई। मेरा बैग देखिये कापी में काम किया हे मैने आओ मेरी गोद मे आओ पहले खूब ढ़ेर सा प्यार कर लूँ तब। मै गोद में जा चढ़ी खूब प्यार किया दादी ने। फिर ड्राइंग रूम में बैठ कर मेरी हिन्दी, मैथ और इग्लिश की कापी देखी। कई बार गुड कहा। कहा कितना साफ और सुन्दर लिखा है? मैने बताया मेरा बैग यूरो किड का? मेरे स्कूल का नाम --- है। मेरा दोस्त भी ऊपर रहता है उसका नाम है------
        फिर मम्मी की पुकार पर चाय पीने चली गई। मै चुप देखती रही कितनी अच्छी है दादी, बाबा!
        कब आयेगा मेरा दोस्त अरनव अभी मै सोच ही रही थी कि दरवाजे पर थपथप का शोर मचाता वह आ ही गया। ओह बड़ा मजा आयेगा। आओ--- आओ मै तुम्हे अपने बाबा को दिखाऊँ। देखोगे वो अपने कमरे में फ्लैट है? हाँ तुम्हारे बाबा आये है चलो-चलो मै कमरे में लेकर उसको आ गई। बाबा बिस्तर पर लेटे है मेरा डाॅक्टरी का इक्पिमेन्ट वाला बाॅक्स। हम दोनो ही चिपक गये। चलो बाबा का पेट देखते है ये पेट क्या बोल रहा है।‘‘ मै बहुत मोटा हूँ मैने बहुत चाकलेट खाई है इसीलिये!’’ बाबा आप चाकलेट खाना बन्द कर दीजिए। अरनव ने मोटा इन्जेक्शन सिरिंज निकाला और इन्जेक्शन लगाने की तैयारी करने लगा। तुम इन्जेक्शन लगाओ। मैं आला लगाकर देखती हूँ कि बाबा के सिर पर बाल क्यों नही हे कहाँ चले गये बाल! मैने उनके सिर पर आला लगा कर पूँछा- कौन सा तेल लगाते है? नारियल का लगाया कीजिए। मेरी मम्मी कहती है नारियल का तेल सबसे अच्छा। आपके बाल तो है नही जो हे वह भी रूखे। नारियल तेल जरूरी है। कह कर मैने दाँत दिखाने को कहा- ओ हो ये क्या दाँत तो एक दम पीले! जीवाणु हमला करेंगे पेप्सोडेन्ट लगाइये। बेचारे एक बाबा------और हम दो डाॅक्टर मैं और अरनव!
        चलो भाग कर लौन में चलते है। अभी नहीं-नहीं अरे चलो न, देखो बाहर मिट्टी में शार्क मछली है क्या? बुद्धु मछली कहीं मिट्टी में होती है वहाँ तो क्रोकोडाइल होगी। भागो, मेरी साइकिल पर पीछे बैठों। मुझे तो साइकिल भगानी पड़ेगी यार। आओ साइकिल के पीछे बैठ जाओ। अरनव की पुकार पर मै दौड़ी।
         दादी आप कहाँ है? पार्क चलेगी? नही, क्यो? तो मैं आपको गाना सुनाऊँ? चक चक धूम। डान्स भी देखेंगी? हाँ ये आइडिया आपको अच्छा लगेगा। तो मै शुरू हो जाऊँ? आँखें मटकाती लटके-झटके मेरी मस्ती! दादी अब तो आप यहीं रहेंगी न। वापस नहीं जायेंगी न? मैं आपसे कहानी सुनुँगी। पढ़ूँगी भी, होम वर्क आप करा देना। बहुत मजा आयेगा। आप जो क्लाक लाई है अलार्म लगा कर मैं जल्दी उठ जाऊँगी। रात में बैग ठीक करूँगी और सुबह नाश्ता कर स्कूल के लिये तैयार। यू तो मुझे चुलबुल, नटखट, बुलबुली भी कहती है मगर मुझे अच्छा लगता है मीठी बस मीठी दादी की मीठी।         
                          

Prakriti aur maanav


             
                                                      प्रकृति और मानव
                                                                                 जोड़ें टूटी कड़ी
   प्रकृति में और मनुष्य के जीवन में बहुत सी ऐसी साम्यताये है जो यदि गौर से देखी जाये तो हमारा मार्गदर्शन करने में अहम भूमिका निभा सकती है। यह हमारे निरीक्षण और ओब्जर्वेशन की सूक्ष्मता निर्भर पर करता है। किसी किताब, किसी के समझाने और अनुशासित करने की जरूरत नहीं।
    हिमालय को देखा है आपने- सफेद वर्फ से घिरा शान्त, ठंडा शीतल, दृढ़ मजबूत अडिग, हजारों वर्षों से अपनी गोद में घने वृक्ष, घाटियाँ, झरने, फूल जड़ी-बूटियाँ पत्थर चट्टान को प्यार से समेटे दुलराते, सभालते अपने पुरूषार्थ के बल पर खड़ा है और संदेश दे रहा है-अपने पुरूषार्थ,  पवित्र विचारो, साहस, प्रेम, हृदय की सहृदयता और सहानुभूति के बल पर जीवन में पुरूष (मानव) भी अपना स्थान बना सकता है नदियों की अजस्र धारा, के समान स्नेह और सहानुभूति, और पवित्र सिद्धांतों नैतिक निष्पक्ष निर्णय जीवन को सफल और सुगम बना सकते है। बाधाये कहाँ नही आती? कोई भी मार्ग सरल सीधा नहीं है अतः चलना, और चलना ही है----
   बेंत क्या होता है? वह तेज हवा से सामने झुक जाता है। विपरीत परिस्थियों-समय के अनुकूल होने तक विनम्र और झुक कर रहने की सीख सिखाता है बेंत के झुरमुट। हवा के तीव्र झोकें, सह कर अनुकूल वातावरण बनाने तक धैर्य धारण कर लेना इन्हीं से सीखा जा सकता है।
    और तो और ऋतुओं का बदलना, रात के बाद दिन और दिन के बाद रात का क्रम यह सत्य जाने आनजाने रोज एक बात तो याद दिलाता ही रहता है कि सुख-दुख और दुख के बाद सुख, अधेरे के बाद उजाला, कुछ भी चिर स्थाई नही है। परिवर्तन ही जीवन, गति और स्पन्दन है। उसके बिना सब मृत, स्पन्दनहीन और जड़।
    क्या झोपड़ी क्या महल! जब सोने की लंका नहीं बची तो किसलिये धनसम्पत्ति को जोड़ना। साँई उतना दीजिए जामें कुटुम समाय। सहज बस सन्तोष ही सबसे बड़ा धन है और जीवन का सरल, समान यापन। इसकी उपलब्धि। छल, दम्म द्वेष से दूर ही रह पाना मानव जीवन पाने की सार्थकता है। शान्ति और बिना किसी पश्चाताप के मरण का वरण शायद इस जीवन का लक्ष्य। और क्या चाहिये-सब कुछ धन दौलत कर्म और उसके फल सब यही रह जायेंगे। क्या होगा मृत्यु के पश्चात ये तो अनन्त का रहस्य है। इसे रहस्य ही रहने दिया जाये और जो है, वर्तमान को बिता लिया जाय यही सच्चा कर्मयोग है-साधना है ईश्वर की ओर बढ़ता पहला कदम है।
                                                      

Meri pahli videsh yatra


                                                       मेरी पहली विदेश यात्रा
                                                                                                               एक संस्मरण
     जब नई दिल्ली एयर पोर्ट से हवाई जहाज ने उड़ान भरी तो एक पल के लिये लगा-कुछ छुट रहा है अजीब सी घबराहट बेचैनी शायद आकाश मार्ग का पहला सफर, और उम्र का 62वाँ पड़ाव और बुढ़ापे का जुड़ाव घर आँगन घरती मही फूल उपवन घर के पेड़ों पर लटके फूलों पर दाना चुगते गौरैयों  का झुण्ड, गोलकी श्यामा पक्षियों का कलरव, मछलियों की कदमों की आहट सुनतें ही पानी में तालाब में हलचल। अंगूरों की लता पर बुलबुल कावन घोंसला और सीटी बजाना। सारे के सारे चित्र सिनेमा की रील की तरह आँखों के सामने घूमने लगें। जीवन के अन्तिम समय में जब साँस टूटने लगती है तो बीता हुआ सारा जीवन याद आने लगता है शायद वही स्थिति लग रही थी मानों धरती ही छूट रही हो सारा संसार आकाश छूट रहा हो।
    रन वे पर धीरे-धीरे सरकता जहाज अचानक सर्र से आकाश छूने लगा ‘‘आपकी यात्रा मंगलमय हो की उद्घोषणा---- ओह तो हम आकाश के शून्य में है?
    बड़ा पागल है मन पिछला पिछला छूटा और सपने तिरने लगे आँखों में कैसी होगी विदेश की धरती, हवाये, आकाश बादल लोग रहन-सहन। सुना तो बहुत था जितने लोग उतनी बाते उतने ही अनुभव हर का अपना देखने का नजरिया और सोच पास-पास सट कर बैठे लोग। शान्त चुपचाप, धीरे-धीरे चलते। सब आवश्यकताओं की सुविधाओं से सम्पन्न। मानों मिनी रूप में हमारा दिन प्रतिदिन का संसार।
     छोटी-छोटी सीटे, सामने छोटा सा टी0वी0 उसके नीचे छोटी-सी फोल्डेबल टेबल प्रत्येक यात्री के लगभग। वर्ग गज के क्षेत्रफल में। चलने-फिरने के लिये हाथ पैर सीधा करने के लिये गैलरी लगभग 200 यात्री। बाथरूम की व्यवस्था। सीटिंग व्यवस्था तो हमारे बस की तरह ही था बस फर्क इतना था कि यह एयर बस थी और बाथरूम की, खाने-पीने की व्यवस्था साथ ही थी। स्मार्ट एयर होस्टेस सुन्दर-सुन्दर परियों की तरह ट्राली पर खाना नाश्ता ड्रिंक सर्व करते शालीन सभ्य होंठो पर मुस्कान चिपकाये ये हेल्पर हैट्स आॅफ टू देम हर किसी से वेज और नाॅनवेज की च्वाइस पूछते एक बार तो सोचा इतने सारे ड्रिंक्स पहले तो ट्रायल के लिये चाय ली कुछ जमी नही तो सोचा अबकी काॅफी चखी जाय। मगर यह क्या! एक घूँट  ने ही मुँह का जायका खराब कर दिया। शायद कोई नई ब्रैन्ड रही होगी। तुरन्त ट्रे में रखी अपनी प्रिय कोक ही मुझे संतुष्ट कर सकी। खाना नाश्ता का स्वाद बिल्कुल फरक था मगर नाम था एशियन फूड कुल मिला कर अच्छा फाॅर अ चेंज।
         परिवर्तन का अनुभव होने लगा था।
    हमारा गन्तव्य था डी0सी0 ----और फिर वहाँ से वर्जीनिया निकट का एक उपनगर आठ घण्टे की हवाई यात्रा के बाद पहला ठहराव था पेरिस एयर पोर्ट। वहाँ की सुन्दरता स्वच्छता और भव्यता का प्रतिनिधित्व कर रहा था। वहाँ से हम बाहर नहीं जा सकते थे। एकदम चमचमाता, समस्त आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न। रोबोट की तरह चुपचाप भाव विहीन चेहरों से चलते-फिरते लोग केवल खटखट ट्राली के हिलने-डुलने की आवाज। अपने-अपने सामानों को स्वयं ही सुन्दर हल्की फुल्की ट्रालियों में ढ़केलते यात्री। शारीरिक                                                       रूप से स्लिम ट्रिम, कुछ लोग दुबले पतले चूसे चुसके आम की तरह कांति विहिन चेहरे तो कुछ हृष्टपुष्ट मगर बहुत कम। शारीरिक मापदन्ड के अनुसार परफेक्ट फुर्तीले मगर रौनक नही तेजहीन अपने में खोये हुये मैं ढ़ूढ़ रही थी उस जीवन की उत्फुल्लता को, उस जिन्दगी को जो मेरे साथ-साथ हँसती खेलती इलाहाबाद से दिल्ली तक घरों, बाजारों रेलवे स्टेशनों यहाँ तक कि रेल के कम्पार्टमेन्ट में बच्चों बड़ो और यात्रियों के चेहरे तथा व्यवहार में झलक रही थी। ऐसा भी कठोर अनुशासन, भावों का नियन्त्रण किस काम का। अति सर्वत्र वर्जयेत। अस्वाभाविक असहज और कृत्रिम।
      मशीन की तरह नियन्त्रित ढ़ंग से पारो बोट की तरह सधे और नपे तुले कदम। चहल-पहल तो कहीं दिखाई ही नही दे रही थी। कभी एक कहानी पढ़ी थी कि एक राजा ने वरदान माँगा था कि वह जिस-जिस चीज को छुयेगा वह सोना हो जायेगी। शायद यहाँ पर लोगों को वरदान था कि यहाँ की धरती पर पैर रखते ही सब कुछ यंत्रवत रोबोट की मुड़ी में आ जायेगा। भौतिकता एश्वर्य की चकाचैंध से किंकित्वयं विमूढ़ तो मै भी थी। ठहराव के समय में मेरे बगल में बैठी एक यात्री अपनी गोद में लेपटाॅप रख कर कानों में म्यूजिक के लिये इयरप्लग लगाये काम में व्यस्त थी और थोड़ी-थोड़ी दूर पर टेलीविजन स्क्रीन पर लगातार आती जाती चित्रावलियाँ थोड़ी देर के लिये अपनी ओर आकर्षित कर लेती।
      अभी अपनी सफर पेरिस तक ही रखते है उसके आगे का सफर वाशिंगटन तक का अगले किश्त में।
  जब दिल्ली से चाल्र्स डी गौल एयर हवाई अड्डे से उड़े तो ऐसा लग रहा था कि हम किसी लोकल एयर बस में बैठे हो क्योंकि आधे से अधिक यात्री तो फ्रेन्च लग रहे थे। यात्रियों की संख्या कम थी आठ घण्टे की यात्रा थी।
                                                                                 

Sunday, September 29, 2013

Campus gossip


                                                                 कैम्पस-गासिप
     कितना नीरस है एक स्कूल टीचर का कार्यक्रम। बरसों लगाता एक ही सा बोरिंग पाठ्यक्रम, करेक्शन । सुबह नौ बजे से दोपहर तक की घण्टियों में बँटी जिन्दगी। वही क्लास, वही बच्चों के साथ दिन की शुरूआत ऐसम्बली, प्रार्थना,न्यूज रीडिंग, और अन्त में जनगणमन। बच्चों की अटेंडेन्स कुछ डाँटडपट, उपदेश, अनुशासन की बाते और भविष्य सुधारने के एक लेक्चर के बाद पाठों का पढ़ाना शुरू।
     मगर हाँ, शैक्षिक सत्र के शुरू होने के साथ साल में दो बार कुछ दिनों के लिये नई हलचल, नये बैच के स्टूडेन्ट्स, नई रूटीन, और फिर जनवरी फरवरी का महीना, साल का अन्त होते-होते कुछ फुरसत के पल।
     फरवरी का महीना विद्यालय में-दशम व द्वदश वर्ग के छात्रों का फेयरवल, टेस्ट, प्रीटेस्ट की कापियों का करेक्शन रिजल्ट फिर एक ब्रेक बस एक दो दिन का, इन दिनों स्टाफ रूम का रंग ही बदला हुआ दिखाई देता, कापियों का ढ़ेर के पीछे छिपे टिचर्स के चेहरे अब बाल सूर्य की तरह दमकते चंचल चुहुल करते, चहकते एक दूसरे को छोड़ते रिलैक्स्ड दिखाई पड़ता चिर प्रतिक्षित फुरसत के कुछ पल छिन मस्ती से भरे।
      हाँ तो अब बताओं। नये सेशन अप्रैल में क्या-क्या होने वाला है? इस फाइनल बैच में तो छुट्टी मिली। भज्जी क्या कहते हो?’’ क्या कहें? तुम्हें क्या यार! तुम तो मैनेजमेन्ट के तुरूप के पत्ते हो! ताश के जोकर! जहाँ चाहो जैसे चाहो फिट हो जाओगे बस-बस तुम्हारा फ्यूचर नेक्स्ट सेशन में पक्का, बिल्कुल पक्का, कौन सा सब्जेक्ट है जो तुम पढ़ा नहीं सकते? फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायो, मैथ यहाँ तक कि इको और कामर्स पर भी तुम्हारी पूरी पकड़ है। जैक आॅफ आल ट्रेड का मुहावरा तुम्ही पर तो फिट बैठता है। मिस्टर बनर्जी ठहा कर हँस पड़े। मेज पर जोर से मुक्का है मारते हुये बोले-तो हो जाये पार्टी इसी बात पर।
     और पप्पे जी। आपका बायो डिपार्टमेन्ट! तो कुछ गरदिश में दीख रहा है। बाय द वे कितने स्टूडेन्ट थे अबकी 12वीं में चार-- बस--- केवल चार। कोई बात नहीं इस साल से नया कम्पलसरी सब्जेक्ट जो आ गया है एनवायरमेन्टल इसलिये पूरा का पूरा क्लास जनरल पढ़ना पड़ेगा और या तो फिर क्लास 1 से 12 बायो आपके नाम हो जायेगा। आपकी नौकरी पक्की! ऐशकरोजी ऐश, पप्पे जी! मिस्टर खान ने अपनी केमेस्ट्री खत्म की गहरा सावला रंग अनएजूमिंग सी पर्सनेलिटी छोटा कद, दूबला पतला शरीर। है लेकिन कोई न कोई गजब का आकर्षण इनमें साहित्य और विज्ञान का सुन्दर और संतुलित काम्बीनेशन! बतो मेें कुछ हास्य और व्यंग का पुट वाक् चातुर्य और बहुमुखी रूचियाँ। किसी सब्जेक्ट पर भी बाते कर लीजिए। फुलकान्फीडेन्स चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया‘‘।छोटे बड़े आबाल वृद्ध सबकी सद्भावना प्राप्त और स्नेह दुलार से भरपूर शिष्ट पापाजी के नाम से लोकप्रिय किसी को चाकलेट टाफी देकर प्रसन्न करते, तो किसी को दोहे शायरी या कविताओं की पंक्तियों से रिझाते देखे जा सकते है व्यंग और चुटकुले तो उनकी पाकेट में ही रहते। ये है हमारे मिस्टर वर्मा।
       छोटा कद गेहुआ रंग गोल चेहरा कमानीदार सुनहला चश्मा स्लिम-ट्रिम       कद काठी छोटी पतली मँूछें। खली पीरियड में अपने स्वयं के रोलर से सिगरेट बनाकर पीते या कभी-कभी पर्सनेलिटी को गंभीर और गरिमामय बनाने के प्रयास में पाइप से धुआ उड़ाते दार्शनिक और स्टूडियस’’ होने का आभास देते लोगों में बाबू मोशाय के नाम से लोकप्रिय मिस्टर भट्टी की अपनी खासियत है। लड़को के बीच के छोटे -मोटे झगड़े निपटाते सुलह कराते समझाते देखे जा सकते है।           
      प्रसिद्ध माडल जान अब्राहम से साम्यता रखने वाले मिस्टर झा का पोनर इम्प्रेशन पतली लम्बी छः फीट की काया गौरवर्ण पतली म ूछे सुबदर श्वेत चमचमाती दन्त पंक्ति पतला लम्बा चेहरा तीखी सुतवानाक, बोलने में कुशल मन्दहास्य कुछ लजाया शरमाया आकर्षक व्यक्त्वि, किसी भी कार्यक्रम के कुशल संचालक (आयंकर) कम्प्यूटर जगत के जाने माने ज्ञाता। कुलमिला कर तीखे व्यक्तित्व वाले मिस्टर झा सर, चाल इतनी तेज की कि बगल से तेज हवा का झोका सर्र से निकल गया हो।
 गोलमटोल गोलगप्पे से चेहरा, धनी  मूँछें बालों का एक गुच्छा अलसाया सा चैड़ा उन्नत ललाट पर झूलता गुरूगंभीर आवाज, धीरे-धीरे सोच-सोच कर बोलने पर विशिष्ट लहजा, सधे कदमों से चलना उठना, बैठना और काम न होने पर हाथ पीछेे कमर पर बाँधे स्टाफ रूम मे ही चहलकदमी करते रहना मैथ्स के मिस्टर नागर के व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। उई माँ तो पागल हो जाऊँगी के परेशान स्वर स्टाफ रूम में अक्सर ही गँूजते रहते। क्या लिखा है लगता है हिन्दी का लिटरेरी ट्रान्सलेशन आई विल ड्रिंक हिज ब्लड मै उसका खून पी जाऊँगा। शेक्सपीयर तो अपनी यह दुरदशा देख कर शायद किसी नदी में कूद कर आत्महत्या कर लेंगे। ‘‘ही वाज ब्वाइलिंग विथ ऐंगल’’वह गुस्से में उबल रहा था। ‘‘आई वान्ट टू टच योर लेग’’ ‘‘व्हाट अ हरिबुल लाइन?’’ मेरी तरफ देख कर हाथ पैर पटकती वह चिल्लाने लगती। मै स्टाफ रूम की खिड़की से कूद जाऊँगी क्या? किस बुरी घड़ी में मैने इंगलिश में एम0 ए0 कर ट्रेनिंग ली की मुझे ऐसे बच्चे पढ़ाने पड़ रहे है। कितनी भी मेहनत करा, समझाते-समझातेे गला सूख जाता है मगर फिर वही ढ़ाक के तीन पात। उनकी आँखों से आँसू टपकने वाले होते है। बेचारी मिस खन्ना।
        कभी गम्भीर, कभी मन्द-मन्द मुस्कराते, और अपनी ही कही बात पर जोर से ठहाका लगाते। चाहे और किसी को हँसी आये या नहीं मगर खुद ही हँस कर दूसरो का ट्यूब लाइट बताने का लहजा थोड़ी देर के लिये सबको शरमिन्दा कर देता। बड़ी कक्षा के छात्राओं से बेहद दोस्ताना व्यवहार और लोकप्रियता-सस्ती चिप्पड़ लोकप्रियता के प्रतीक मिस्टर दूबे जिसे सब मिस्टर डूबे’’ के नाम से सम्बोधित करते। कक्षा में पढ़ाते-पढ़ाते कोई न कोई काण्ड कर ही देते और आग बबूला होकर क्लास से बाहर निकल आते। छोटे-मोटे गोरे इतने कि गुस्से में लाल आग का गोला ही लगते। स्टाफरूम में कापी किताब पटक कर नये जमाने के छात्रों के लिये अपशब्द कहते झनकते पटकते और फिर शान्त हो जाते। स्तब्ध शान्त अन्य शिक्षक अनकी ओर हतप्रभ देखते ही रह जाते मौन बिल्कुल मौन।
        दुबली-पतली नाजुकता की परिभाषा रंग बिरंगी गुडि़या सी सजधज, गले की आवाासज को दबाकर बनावटी-सी शी्रल्ड आवाज, प्रत्येक को नाम से सम्बोधित कर गुड माॅर्निंग मिस्टर शर्मा या फिर कोई और नाम। पर होता है सबका व्यक्तिगत सम्बोधन प्रशांसा करने लायक कलात्मक शौक विशेषकर स्वयं को प्रस्तुतिकरण। भव्य सुन्दर गौरवर्ण किन्तु भावहीन चेहरा। सब कुछ यान्त्रिक संवेदनाशून्य व्यवहार। सबके प्रति कोई न कोई व्यंग भरा कमेन्ट। कभी-कभी स्टाफ में प्रवेश कर वातावरण को गंभीर बना जाती मिस रूबी। कोई व्यक्तित्व इतना बोझिल भी हो  सकता है यह सोचने को विवश करता है।
        अनुशासन की छड़ी तेजतर्रार, स्पष्टवादी छोटी-सी फिरकनी की तरह इधर-उधर दौड़ती, फुर्ती इतनी की फ्रन्टियर मेल का खिताब पा चुकी गंभीर तनाव ग्रस्त चेहरा। मुस्कान तो कभी भूले भटके ही इधर का रास्ता नापती है और खुदा न खास्ता भटक गई तो अन्दर का हृदस मोम की तरह कोमल हेल्पफुल । फिल्मों के मस्ती भरे रोमान्टिक गीतों को गुनगुनाता चहकता चेहरा देखा जा सकता है। किन्तु ये पल दुर्लभ ही होते है। मिसेज महाजन का जबाब नही।
          लम्बा चैड़ा आकार, छः फीटी काया, तीखी धूप सा गोरारंग चैड़ा माथा  लम्बी कमर तक झूलती केशराशि कुल मिला कर झाँसी की रानी खेल कूद में राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाली स्पोर्ट्स वुमेन का आपना ही स्थान है स्टाफ रूम में जिसके प्रवेश करते लगता है भूकम्प  एक झटका और डोलने लगती है धरती। कुर्सी पर बैठे लोग उछलपड़ते है जगहें बदल जाती है हलच लमच जाती है। धराप्रवाह व्यंग, धक्का मुक्की छेड़ छाड़। खुशनुमा माहौल। सभी क्या लेडिज क्या जेन्ट्स सब मधुर रस में सराबोर हो जाते। मानों होली के रंगों की पिचकारी चलरही हो रंग अबीर गुलाल आस-पास छलक बरस रहे है। टिफिन को लेकर छीना झपटी, धूम-धूम कर हा किसी के टिफिन को सूघते खाते। बस एक ही लाइन याद आती है’’ होली खेले मिस राधा- होली खेले मिस राधा (स्टाफ रूम)
   आनन्द मन की अनुभूति है वह बाहर से नही आती जब अन्दर बाहर का वातावरण सहज हो तो खुशियाँ छलक पड़ती हैं। संतोष और अपनेपन का अहसास ही इसका मूल कारण होता है। काम करने की जगह हो अपनेपन के साथ जोड़ कर कार्य की गुणवत्ता और करने के जोश को बदला जा सकता है। और इन्ही दिनों की मस्ती, पूरे साल रह-रह कर मन को चहका कर प्रेरित करती रहती है। काम में डूबा हर शिक्षक सोच-सोचकर  मन ही मन मुस्करा उठता है और जुट जाता है कापी करेक्शन तथा नोट की तैयारी में। नये पाठों के लिये। कमर कस लेता है कि अबकी कुछ नया होकर रहेगा। आकाश में एक नया तारा चमकेगा। स्कूल हमेशा की तरह कोई नया कीर्तिमान स्थपित करेगा।