Sunday, January 17, 2016
Saturday, January 16, 2016
Pahal
पहल
कल भाभी का अनुरोध भरा पत्र आया हे बरसों बाद ‘‘ सबसे छोटी बेटी की शादी है आपकी सबसे प्यारी भतीजी आइयेगा नः आखिरी शादी ह ैअब तो रिटायर हो गई है। याद कीजिये उन दिनों की जब मै शादी होकर आपके घर आई थी। और दो साल बाद आपकी शादी तय हुई थी आपने स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था और मैं घर पर रहती थी कितनी सखी भाव से दोस्ताना था हमारा। स्कूल कालेज की बाते सुनकर मुझे भी मजा आता है। कपड़ो साड़ी स्वेटर आदि का अदला-बदली कर आप कालेज जाती। बाते बताती और एक दूसरे से खुश होते। फिर आपकी शादी हो गई उस समय आपकी शादी के लिये शापिंग गहने कपड़े साथ-साथ रोज शापिंग के लिए जाना ---- याद है न?
आप तो अच्छा मौका हैै। आप आइये साथ-साथ बेटी की शादी के लिये शापिंग करेंगे तैयारी में हेल्प हो जायेगी और पुराने दिनों को फिर से जी लेंगे हम। आयेगी न?पत्र को लिये-लिये मै अपनी बालकनी के सबसे प्रिय कार्नर में बैठ गई। जनवरी का महीना। ठंडी हवाये चल रही हे गलन भी बढ़ गई है ग्यारह बजते-बजते धूप निकली है मगर ठंडी। फिर भी बालकनी में बैठने का मोह न छोड़ सकी हल्का शाल लपेट कर बालकनी में जा बैठी पत्र को बार-बार पढ़ रही थी और आँखों से आँसू बह रहे थे। आँसुओं से धुंधली हुई आँखों में पिछली बाते चित्र की तरह तिरने लगी।
समय बहुत बीत चुका था। वर्षाे का अन्तराल कम्यूनीकेशन का अभाव। सम्बन्धों की डोर टूट चुकी थी। हाँ सच है ये बिल्कुल सच। जब-जब मुझे जरूरत पड़ी मैं दौड़ कर अधिकार के साथ अपने मम्मी पापा के घर जा पहुँचती। नई-नई घर की बहुये न चाहते हुये भी हमारा स्वागत सत्कार करती प्यार दुलार से हर समय ख्याल रखती। चाहकर सर्दी-गर्मी दुख-सुख में सबसे सुखदायी घोंसले की तरह मायका ही याद आता। पढ़ाई लिखाई, नौकरी, शादी, बच्चो के जन्म, और ससमय बीतने पर बच्चों के जन्म, शादी ब्याह माँ बाबू जी के न रहने पर यही एक मात्र स्थान था सुरक्षित और आरक्षित। माता-पिता भाई भाभी उनके बच्चे वे सब तो हमारे लिये ही थे।
लेकिन मैं --- मैं क्या उन चीजो का प्रतिदान कर सकी। जब उनको जरूरत हुई भले ही उन्होंने कहा न हो क्या मैं वहाँ पहुँच सकी। हर बार यही कहती रही कैसे आऊँ प्राइवेट नौकरी है छुट्टियाँ नही मिलती बच्चों का स्कूल है। औरा कभी भी उनके लिये प्रस्तुत न कर सकी। और उनकी आवश्यकता पर न पहुँच सकी सारा जीवन घर नौकरी, एकल मेरे परिवार होने के कारण इतनी व्यस्तता रही कि जीवन के परिवार अन्य सम्बन्धों के प्रति उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों की प्रतिबद्धता के प्रति न्याय न कर सकी और ना ही ध्यान गया। जाने अनजाने यह क्यों और कैसे हो गया मेरा मन आज भी नही समझ पा रहा है। स्वयं को अपराधिनी सा ही महसूस कर रही हूँ।
आज तो रिटायर होने के बाद समय ही समय है आज फिर से टूटे हुये सम्बन्धों के तारों को जोड़ने की बात बार-बार मन को उत्तेजित करती है कम्यूनीकेशन के अभाव में शायद रास्ते बन्द हो चुके है कहाँ से जुड़े कैसे जुड़े।
अचानक आये यह पत्र ने मेरी सारी दुविधा दूर करता हुआ यह एक विश्वास युवावास्था की दोस्ती, गलतियों को नजर-अन्दाज कर देने का संदेश था आह्वान था मनुहार था।
मुझे जाना ही होगा। पता नही उनके घर वालों भाई-भतीजांे, उनकी बहुओं की क्या प्रतिक्रिया होगी। स्वागत होगा या नही। मगर कोशिश करने में क्या हानि है यदि यह निमन्त्रण महज औपचारिकता है तो भी स्वयं उसका अनुभव कर लेना ही न्यायपूर्ण है।
छोटे बेटे को आवाज लगाते हुये मैने कहा राघव बम्बई का एक टिकट करवा दो। मामा की बेटी की शादी है मै वहाँ जाना चाहती हूँ राघव! 31 जनवरी की शादी है।
Sunday, November 1, 2015
Kuchh to Bataiye
कुछ तो बताइये
परिवर्तन सृष्टि का नियम है चलते रहना जीवन और रूक जाना मृत्यु है। समाज के विकास में भी यही नियम है मान्यतायें बदलती है आवश्यकतानुसार विचार बदलते है सोच और दिशायें बदलती है। नही बदलते है तो हमारे शाश्वत नैतिक मूल्य। नैतिक मूल्यों के व्यवहारिक प्रयोग में निरंतर गिरावट देखी जा रही है। माता-पिता परिवार विद्यालय अध्यापक शिक्षा शास्त्री सभी हैरान परेशान है मौखिक रूप से हर व्यक्ति अपने स्तर पर दया करूणा सहयोग सम्मान आदि मानवीय गुणों की संवेदनाओं के लिये उपदेश देते रहे है लेकिन नतीजा कुछ भी नही। जितना नैतिक शिक्षा पर बल दिया जा रहा है लोग सर्तकता और सावधानी बरत रहे है उतने ही भयानक और विपरीत प्रभाव हमें दिखाई पड़ रहे है।
क्या है इसका कारण कहाॅं हम चूक रहे है कौन है जिम्मेदार? कौन सी चीज हमें पतन की ओर खीच रही है सभी अपने-अपने दायित्व निवर्हिन को सही बता कर मीडिया पर दोष मढ़ रहे है। इसी पृष्ठ भूमि को लेते हुए वर्तमार समाज में गिरते नैतिक मूल्यों को कारण मीडिया ही है क्या सोचती है हमारी युवा पीढ़ी? भुक्त भोगी अनुभव करने वालों का किशोरों की क्या सोच है अनुभवों के धनी हमारे वरिष्ठ जन इसे किस तरह समझाना और समाधान देना चाहेंगे। यदि कुछ समय दे कर दिशा बोध हो सके तो आभारी रहँूगी मैं----
Pita
पिता
तुम बरगद की छाँव पिता हो
औ, घर की देहरी का दीवा
धुरी रहे परिवार की घर आॅंगन के प्यार की
तुम बरगद की छाँव पिता हो,
आँधी या तूफान हो, सागर विफरे
या फिर आया कोई भूचाल हो
हर बच्चे के लिए साथ मे
कस कर थामें हाथ हाथ में
साहस का वरदान पिता हो
ना कोई टूटे ना हो आहत
तुम बरगद की छाँव पिता हो!
Aankhein nm kr jaati hain
आँखे नम कर जाती है
कुछ यादेेें ऐसी होती है
जो दिल पर छाई रहती है
जितना भी दिल टूटा हो
बस आँखें नम कर जाती है
बचपन की स्कूलों की
प्यारे सखी सखाओं की
हॅंसी ठिठोली, जोर-जोरी,
छीना-छीनी, रूठा-रूठी
बस आँख नम कर जाती है
क्यों मौसम बदला करते है
क्यों तेज हवायें चलती है?
सब तितर-बितर हो जाता है
क्यों तेज कसक सी उठती है
क्यों समय बीत हर जाता है
क्यों भूल नही कुछ पाता है
दुख की हो या सुख की यादे
बस आँखे नम कर जाती है
कुछ यादें ऐसी होती है
जितना भी दिल टूट हो
बस आँखें नम कर जाती है
यों दिल पर छाई रहती है
Sunday, June 21, 2015
Kya Kahenge
क्या कहेंगे?
कोई इतना संवेदनहीन कैस होे सकता है वह भी आज के वर्तमान समय में मेरा मन न जाने कैसा-कैसा हो रहा है घर से परिव्यक्ता बेटी न जाने कितने सालों से रह रही थी। कभी जिसकी किलकारियों से घर गुन्जा था, चंचल नटखट क्रिया कलापों ने हसाया था युवा किशोरी से युवा होती बहन के अरमान जगे विवाह हुआ मगर भाग्य की मारी को वापस अपने बाबुल घर आना पड़ा। पति घर में पटी नही 65 वर्ष तक का जीवन माता पिता भाई बहन भाभी भतीजे भतीजी के साथ बीता। बीमारी ने जो घेरा तो मौत की नींद सुला कर ही छोड़ा और उसकी तेरही के दस दिन बाद ही भतीजे का मुण्डन उसी घर में यह कह कर कि ये शुभ कार्य तो हो सकता है। वो जो मरी है वो तो लड़की थी घर की उसका क्या यहाँ से क्या मतलब लड़कियाँ तो इस घर की नही होती अब गई नही ससुराल तो क्या हुआ मुण्डन कराया जा सकता है और हो गया सब कुछ रीति रिवाज के अनुसार। वाह री समाजिकता, साथ सामीप्य, यादें सब धरी की धरी रह गये। गून्जने लगे मुण्डन संस्कार के गीत। रो रही थी तो बस दो आँखे, माँ की आँखों से झर रहे थे आंसू कोई देख न ले झट से भर-भर आती आँखों को पोछ लेती।
निर्णय भी किसने लिया एक स्त्री ने, एक स्त्री को नकारने का भयंकर निर्णय। क्या पुरूष है मेद-भाव का उत्तरदायी? क्या पुरूष है कठोरता का प्रतीक? यह नारी ही है नारी की हन्ता तो भेद भाव की सृजन कर्ता उसे क्षमा नही किया जा सकता पुरूषों को दोष न दे। सुधारना है तो नारी सुधरे। नारी को सजा मिले। नारी हो नारी की शोषक है शोषक है------
Park mein ek Sham
पार्क में एक शाम
बैंगलूर के पाॅश इलाके व्हाइट फिल्ड का सुन्दर पार्क चारों-ओर लम्बी ऊँची मल्टीस्टोरीड इमारतें, भव्य और आकर्षक, समस्त आधुनिक सुविधाओं से लैस मगर शाम होते-होते ही 5-7 के बीच पार्क भर जाता बिल्डिंग में रहने वाले 10-12 वर्ष तक के बच्चों और उनकों लेकर आने वाले आयाओं से। कुछ बच्चे झूलों पर झूल कुछ सीढ़ी से फिसलते, सी-साॅ में उछलते तो कुछ छड़ो को पकड़ कर बन्दरों की तरह लटकते व्यायाम करते। रंग-बिरंगे फूलों की तरह-तरह की नयी ड्रेस, शोर गुल दौड़ते भागते। ऊपर से सातवीं मंजिल की बालकनी में खड़े होकर इस मोहक दृष्य को पास से जाकर देखने का लोभ मैं रोक न पाई और लिफ्ट से नीचे आ गई। अभी कुछ ही दिनों पहले अपने बेटे-बहू के घर हम लखनऊ से आये थे।
पोती का और बेटे-बहू के पास कुछ दिन बिताने का सुनहला अवसर। और फिर बैंगलोर से माॅर्डन का आन्नद कुछ दिन बिताने का सुनहरा अवसर और फिर बैंगलोर के ऐसे माॅर्डन सिटी का आनन्द और अमेरिका के लाइफ स्टाइल का रूप बताया जाता था मन में थोड़ा सा वह भी लालच भी था।
लिफ्ट से उतर कर हम उसी पार्क में आ गये जहाँ जिन्दगी शायद अपने सबसे सुन्दर रूप में खेल रही थी चारों तरफ देखा बड़े बुजुर्गों के बैठने के लिए बेंचेज भी बनी थी पार्क का एक चक्कर लगा कर हम भी वही बैठ गये जिया भी वही थी अपने दोस्तो में मस्त थी बहुत देर तक तो इधर-उधर दौड़ती भागती दिखाई दी मगर कुछ देर बाद नजर न आई उसकी आया अपने अन्य आया दोस्तों के साथ गप्प मारते दिखाई दी जिया की ओर उसका ध्यान न था पेड़ के नीचे बेंच पर बैठे हम उसके दादा-दादी देख रहे थे अचानक कि अपने से छोटे बच्चों के साथ छुआ छुई खेल रही थी खिलखिला रही थी उन्हें प्यार से खेला रही थी मगर उसके अपने हम उम्र बच्चे उसके साथ नही थे कहा गई उसकी दोस्तें वे भी आयी होंगी यहाँ मैने भी एक चक्कर लगाने की सोची और धीरे-धीरे चल पड़ी उस ओर। उसकी चारों दोस्त झूला झूल रही थी मगर जिया, तो अलग ही अपने नन्हे दोस्तों में मस्त थी किसी को झूला झुलाती किसी के पीछे भागती सहलाती दुलराती। कही रेत के ठेर पर बैठ कर घर बनाती खुद लीडर बनी उन छोटे बच्चों की टोली को ले चलती लेकिन अपनी उम्र के लड़कियों के साथ नही बड़ा आश्चर्य हुआ उसका यह रूप देखकर अचानक उसके दोस्त ने पीछे से धक्का देकर गिरा दिया गिर कर उठी गुस्से से जिया ने उसे देखा आर तड़ से एक झापड़ जड़ दिया अरे! यह क्या इतना गुस्सा क्या हुआ मै दौड़ी उसकी मम्मा भी आ गई सब आया अपने-अपने बच्चों के लिए दौड़ पड़ी बच्चे उनसे चिपक गये कुछ मम्मियां भी जुट गयी तमासा सा खड़ा हो गया और घेरे के बीच जिया अपने रेत के बनाये घर के पास छोटे राहुल का हाथ पकड़े खड़ी थी चुप एकदम चुप घूर-घूर कर सबको देखती हुई। कोई उसको कुछ कहने का साहस न कर सका
आगे बढ़कर अन्याय के बिरोध करने का गुण साहस शायद जन्मजात ही होता है कोई सिखा नही सकता केवल परिष्कृत कर सकता है सही दिशा दी जा सकती है आवश्यकता है बच्चो के क्रिया कलापों को ध्यान से देखा जाय उसके पीछे भावनाओं को समझकर गुणों को विकसित किया जाय।
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