Friday, March 23, 2012

दिवस परम्परा

गौरैया दिवस

ओह
,यह ' दिवस परम्परा ' मेरी समझ न आई ,

सुबह
सवेरे जब झूले पर मैं गौरिओं को दाना देने आई .
शोर मचाती चीं चीं करती मेरे इर्द गिर्द घिर आईं
कानों को सुख देने वाला मधुर मनोहर शोर नहीं था ,
यह तो कलरव या कल्लोल नहीं था
अरे- अरे यह आज हुआ क्या ?
मैं उन्हें देख घबराई

गौरैयों ने शायद व्याकुल होकर एक सभा बुलवाई
डरी - डरी सी , सहमी- सहमी भोली - भाली औ निरीह सी ,
घर - घर में हर छज्जे , छत में लटक रहे क्यों झूले नभ पर ?
क्या कोई षड्यन्त्र रचा है ? दाने पानी सुंदर मटके रख कर
बुला रहे क्यूँ हमें हरख कर? शहरों की ये नई अदाएं हमें रास न आईं ।
" 'गौरिया का दिवस " मनाकर कहीं और कुछ शामत आई ?
गौरियों ने व्याकुल होकर एक सभा बुलवाई'
ओह यह दिवस परम्परा मेरी समझ न आई'

Monday, November 7, 2011

एक दीया जला लो

उठो ,आंसुओं को पौछ डालो ,
अँधेरा बहुत है ,एक दीया जला लो ।
सिसकियों से शायद सहम से गए हो ,
रोते रोते भरम से गए हो --
उठो आंसुओं को पौछ डालो ।
क्यों हो गुमसुम ,उदास अनमनें से
चलो , हिम्मत न हारो,बढ़ चलो -
उठो ,आंसुओं को पौंछ डालो
जितना डरोगे डराएगी दुनिया
जितना सहोगे सताएगी दुनिया
चलो पास बैठो ,ज़रा मुस्करा दो
हिम्मत न हारो ,एक दीया जला लो
उठो आंसुओं को पोंछ डालो .

Sunday, June 26, 2011

snehshakti: वर्षा की फुहार

snehshakti: वर्षा की फुहार

वर्षा की फुहार

झिर -झिर ,झिर-झिर ,लगातार
वर्षा की फुहार ,
धरती पर है सहज प्यार ,
नभ का अपार बरसे बहार
झिर -झिर ,झिर -झिर लगातार
वर्षा की फुहार ।
कुछ हरा - हरा ,कुछ भरा - भरा,
पावस ऋतु का भण्डार नया ।
अंकुर,किसलय ,नदियाँ , पहाड़
सोंधी सुगंध फिर मलय बहार ।
झिर - झिर झिर -झिर लगातार ,
वर्षा की फुहार .

Thursday, June 2, 2011

यादें

यादों के गलियारों में
कुछ भूले बिसरे चित्र जड़े
कुछ धुंधले कुछ चमक रहे
यादों की गलियारों में

चलते चलते बरसों बीते
बीज वृक्ष बन हुए खड़े
शाखाएं फूटी, बचपन बीता
यौवन की दहलीज पार कर
अंतिम पड़ाव पर थके पड़े

सुस्ताते, बैठे, वानप्रस्थ के द्वार
जीवन में हम जीते या फिर पाई हार
काश लौट आते वे दिन और फिर
जी पाते सारा जीवन
करके भूल सुधर

यादों के गलियारों में
कुछ भूले बिसरे चित्र जड़े
कुछ धुंधले कुछ चमक रहे
यादों की गलियारों में

Thursday, March 17, 2011

आया बसंत

मेरे उपवन आया बसंत ,छाया बसंत।
कभी मंद और कभी तेज ,
प वनों के झोंकें , डरे डरे ।
नन्हीं कलियों से लदे - भरे ,
फल - फूल झूमते खिले -खिले
फूलों में मधु और पराग ,
कण- कण में बिखरी सुगंध .
मेरे उपवन आया बसंत .छाया बसंत .
धारे किरीट , बुलबुल की है , अजब शान
चंचल श्यामा , aur niilkantha ,
कोयल ,महूक ,कागा दुरंत ,
रंग -रंग के पंछी अनंत
मेरे उपवन आया बसंत , छाया बसंत।
चिड़ियों का कलरव मधुर गान ,
भ्रमरों की गुनगुन का वितान ,
गुंजित जैसे हो जलतरंग ,
मेरे उपवन आया बसंत .छाया बसंत।
मन भाया बसंत , आया बसंत.


Saturday, October 30, 2010

सन्देश

वसंती हवा का का प्यारा सा झोंका ,
तरु की शिखा पर से सनसनाता
कलियों को झुक कर थपथपाता ,
बिंदास ,अल्हड ,और मस्त मौला ।
नदियों की चंचल लहरों को छू कर
आगे चला ---आगे चलता गया .
भवरों ने टोका ,तितली ने रोका
बटोही हो तुम ?कहाँ से चले हो ?
कहाँ जा रहे हो ? ठहरो ज़रा ;
कुछ सुनते सुनाते , गुनगुनाते
न रोको मुझे , न टोको मुझे
दूर जाना बहुत है ,लहरों का सन्देश ले कर
सागर किनारे ,बादलों के घर जाकर ।
की वो चल चुकीहैं ,वो आ रही हैं

न कोई पाती ,न कोई चिट्ठी
बलखाती लहरती,धुन में मचलती
खिंची आ रहीं हैं ,चली आ रहीं हैं
न रोको मुंझे न टोको मुंझे .बस
मैं आगे चलाहूँ .मैं आगे चला हूँ .