Sunday, May 5, 2013

Bada katora

                                                         बड़ा  कटोरा
      ये अचानक कहाँ  जाने की तैयारी कर रहे हो बबलू के बाबा देख नहीं रहे हो कितनी ठंडी हवा चल रही है बीमार पड़ोगे क्या? अपनी पत्नी का टोकना न जाने मुझे क्यों अच्छा नहीं लगा। झुझला कर बोला टोक दिया न! कितनी बार कहा है निकलते समय टोका न करो कल सच्चे भैया की बहूरानी का फोन अन्यथा बहुत बीमार है मुझे ढूढ़ रहे थे मुझे जाना ही होगा। नहीं, नहीं तुमने वहाँ न जाने की कसम खाई थी। भूल गये उस अपमान को किस तरह जलील किया था उन्होंने पैसे का और पद का इतन घमण्ड! नहीं, नहीं आप नहीं जायेंगे मैने एक तीखी नजर पत्नी पर डाली ’’ नहीं मुझे जाना ही होगा बड़े बाबूजी का नमक खाया है। बचपन से लेकर बड़े होने तक सच्चे भैया को सिखाया है पढ़ाया है मै बड़े बाबूजी को भूल नही सकता उनका कर्ज मुझे चुकाना है कह कर मैने जल्दी से झोला उठाया और बस स्टैण्ड की ओर बढ़ चला। बस से बनारस तक पहुचने में तीन घण्टा, फिर वहाँ  से बड़े बाबूजी का बंगला एक घण्टा।मेरी आंखों   के सामने सिनेमा बीते वर्षों के सिनेमा की रील चलने लगी
      बड़े बाबूजी ने मुझे गाँव व से तब अपने यहाँ  बुलवाया था जब मै 18 वर्ष की उम्र का था बारह की परीक्षा देकर आगे कुछ पढ़ने की इच्छा में उनके बंगले पर  पहुं चा था। उन्होंने अपने दो लड़को और दो लड़कियों को पाँच  से सातवीं कक्षा में ट्यूशन पढ़ाने का काम सौंपा था। खुद बड़े बाबूजी शाम को अपने दफतर में आराम कुर्सी पर बैठ मोटी-मोटी काम की किताबें पढ़ते रहते और दरवाजे पर चिक सामने बरामदे में बैठ कर सच्चे भइया और बच्चों को पढ़ाया करता। आठ बजते-बजते छुट्टी पाजाता घर का बाजार का कुछ छुटपुट काम कर खाना भी वही खाता महरा--रसोईघर से खाना परोस देती सब कुछ अच्छा चल रहा था। चालीस वर्षों की सच्ची सेवा सच्चे भइया बच्चे पढ़लिख कर अफसर बन गये शादी हुई बहुयें आई बच्चों नाती पोतों की किलकारी से घर आँगन गूंजा । और फिर बड़े बाबूजी के न रहने का मनहूस दिन और मेरा वापस गाँव  आने का संकल्प 20-30 साल का अन्तराल और फिर अचानक बहू रानी का फोन-हमें आपकी बहुत जरूरत है काका आ जाइये। पता नही क्यों कहना चाहते है बहुत बीमार है पिछली बाते सब भूल जाइये । यह सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया विशाल महलनुमा घर के एक बड़े से बन्द कमरे में आराम कुर्सी पर लेटे शून्य में छत को एक टक निहार रहे थे सच्चे बाबू दिन में भी अंधेरा। इतना बड़ा घर और हवा रोशनी  धूप पानी वर्षा की फुहार खुले वातावरण की इतनी कमी। बाहर तो इतना बड़ा खुला आकाश, उसमें तपती रोशनी की किरणे बिखेरता पीला दमकता सूरज मगर कमरे में उसका प्रवेश निषिध छोटी-छोटी झरोखे नुमा खिड़कियाँ । दुनियाँ  से कट कर कैसे रह सकता है कोई। बड़ा सा आयताकार डाईनिंगरूम। 12 लोगों के बैठने के लिए उसी से मैचिंग डाईनिंग टेबल। चारोां तरफ दीवारों पर अनगिनत फोटो ग्राफ्स। कहीं परिवार के साथ, कहीं पत्नी और कहीं बच्चों के साथ। पेन्टिग्स चप्पा-चप्पा दीवार को सुसज्जित। आलमारी तथा शोकेश में बेशकीमती क्राकरी, सजावटी चीजेंमगर जीवन्तता कहीं नहीं। जैसे किसी म्यूजियम में आकर बैठ गये हों अजीब-सी दहला देने वाली चुप्पी। ड्ाईंगरूम के बड़ा सा हाल हिंसक जन्तओं के शेर का भयानक कालीन पर चिंघाड़ता हाथी, दौड़ते, घोड़े, चमड़े के आवरण से मढ़ा हुआ घोटक का मुख
       यही था वह घर आज से लगभग 15-20 साल पहले। ज्यादा समय भी तो नहीं गुजरा। बाबूजी का पुराना घर छोड़कर असमें आयें हुये। बाबू जी का घर- बड़ा सा आँगन । खिलखिलाती धूप। चहचहाती चिडि़यों गौरैयों का झुण्ड। उस आँगन  गन में एक किनारे अमरूद का फलदार पेड़। दूसरी तरफ टीने के शेड के नीचे बॅंधी दो जरसी गायें। साफ सुथरे नाद, सुबह शाम 15-15 किलो दूध। एक चूल्हे पर दिन भर दूध का औटते रहना। दूध, दही रबड़ी मलाई का अम्बार। दरबार खुला सा रहता। हवा पानी धूप छाँव  आफरात। घर के हर लोगों को उपलब्ध, घर में सब भाई बहनों का, चाचा, चाची, मौसी, मौसा, बुआ, फूफा, घर के ही नहीं आस पड़ोस को भी मिला जुला कर बॅटता।
       कचनार की कलियों की टिकियाँ , कटहल कटहली के कबाब, कोफ्ता, नीबू करौदा, आम पपीता अनार अमरूद का आनन्द। अंगूर की लतर, जूही, चमेली के फूलों की गदराई बेल गमकती महकती तारों से नन्हे सफेद फूलों की महक। हर को खुशी बाँट ते  दुख-सुख को सुनते समझते खुशी और गम के हिन्डोले में फूलते कब दिन बीत जाते बच्चों को कभी डांट  पड़ती तो सामने गोल आकार के बने लान में गोल-गोल चक्कर लगा कर इवनिंग walk के बहाने सुनहले भविष्य के सपने बुनते कितने घण्टों बीत जाते। नौकर बुलाने जाता चलिये आठ बज गये है खाना खाने। और सब रसोईघर में पहुँच हूँ  जाते। मिट्टी का चूल्हा, लकड़ी पर बनती पकाती दाल की सोंधी महक रोटी सब्जी। अम्मा गरम-गरम रोटियाॅं सेकती और पीछे पर बैठकर आलूकी मसालेदार लहसुन मिर्च वाली भुजिया के साथ। भाइयों के लिये टेबल लगाती जब मैने देखाना आम्मा का एक व्यवहार जरूर पक्षपात  पूर्ण रहता  बड़े से कटोरे मे सच्चे बाबू भइया के लिये अलग से बड़े काटोरे में खीर और बहनों के लिये उससे छोटे कटोरियों में खीर। स्कूल से लौटकर आते शाम के नाश्ते में यह भेदभाव देखकर सभी एक बार माॅं से इसके प्रति विरोध जरूर प्रकट करते और हमारी अम्मा साहब जो कम बोलती मुस्करा कर बात टाल जाती। और फिर सब कुछ सहज सामान्य। बाकी दो भाई हाॅस्टल में रहकर पढ़ाई करते छठे  छमासे -------घर --आते -जाते
        दिन पंख लगा कर उड़ चलें। दिन महीने में महीने सालों में और दशक -दशक वर्षों का समूह। सब बड़े हो गये विवाह बच्चे नौकरिया और बहनों का आना कम होता गया। एक दिन वह भी आया जब माँ  न रहीं। रह गये पिता भाई भाभी और भतीजे। मायका तो जब तक मा माँ रहती है तभी तक रहता  है  माँ का यानी मायका तब क्या पता था माॅ ने अपनी मन्द मुस्कान से मन ही मन बाबूजी को क्या संदेश दिया था कि अपनी अर्जित सम्पत्ति को वह पाॅच भागो में बराबर-बराबर बाॅट गये। कारण चाहे जो भी रहा हों। लिखित रूप में कानूनी कार्यवाही से तीन बहनों और दो भाइयों में बराबर का हिस्सा। तब तक काश संम्पत्ति में बेटियों के अधिकार को काशन नही था। मगर माॅ की बेटियों को आर्थिक स्वतन्त्रता और सम्मान की अधिकारिणी मानने वाली माॅ ने अवसर मिलते ही अपने अन्र्तमन की अदम्य इच्छा को पूरा करवा ही दिया था। मगर वह भाई बचपन से ही बड़े कटोरे की खीर दूध, दही और मलाई वाले भेदभाव को जीवन भर न भुला सकें। और सम्पत्ति का यह विभाजन सदैव जीवन भर उनकी आॅख को किरकिरी बना रहा थोड़ा-थोड़ा छोटा-सा भाग देकर समस्त पर ---- अधिकार जमा कर कुछ वर्षों तक साम्राज्य का उपयोग करने का झूठा दम्भ खा। मगर ईश्वर की लाठी में आताज नहीं होती सुना था देखा नही था। जीवन के अन्तिम वर्षों में इतनी पीड़ा, शारीरिक व मानसिक कष्ट अहम् बहुत बुरा होता है। स्वयं को सही सिद्ध करने में कितने झूठो का सहारा, छल, प्रपंच अपनों से कट-छट कर चुपचाप लेटे उफ-उफ! कर करवटे बदलतें, विशाल कमरा, दो  झूलने वाली कुर्सी, दवाओं से भरी रैक, आलमारी एक छोटी-सी खिड़की। जिस में से मुठ्ठी भर धूप और प्रकाश ही आ सकता है। क्या इसी के लिये इतना सब माया जाल रचा था?
       दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल में चिकित्सीय सहारों पर लेटें, मानसिक रूप पूर्ण चैतन्य तार्किक, अनुभूतियों से चैकन्ने आने वाले अतिथियों से कहते मैं भीष्मपितामह हूँ  मैं भीष्म पितामह इस शरशैया पर लेटा शारीरिक कष्ट भोगता जीवन का अन्त देख रहा हूँ । विवश, हताश। इसी जीवन में यही पर अपने पिता के प्रति किये विश्वास घात, दुष्कर्मों का फल मिलता है मै इसका जीता जागता उदाहरण हूँ । मुझे क्षमा करना मेरे प्रिय जनों मुझे क्षमा करना। चाटुकारों  से घिरा, विमूढ़ मुझे क्षमा करना। मुझे क्षमा करना मेरे बच्चों को मेरी गलतियों की सजा न देना।

Sunday, April 28, 2013

Pahala Kadam

                                                              पहला कदम
    
      यह उत्तरदायित्व लड़कियों का ही है कि वह स्वयं को जानबूझ कर किसी खतरे में न डालें। वर्तमान में समाज की स्थिति, लोगों की मानसिकता को समझाते हुए लड़कियों, माताओं और बहनों को अपनी समझ बढ़ानी होगी। सोच समझ कर निर्णय लें ऐसी जगह जाने से बचें जहाँ  दूसरों को हावी होनें का मौका मिल जायें और आप या बच्ची अकेले पड़ जाये। सावधनी हटी दुर्घटना घटी। मजे और मजाक से दूर रहे क्योंकि इसी में दुरव्यवहार होता है और हो जाता है। समझदारी से भी मजा और आनन्द लिये जा सकता है। प्रदूषित वातावरण में न जाने में ही समझदारी है कहाँ खतरा है और कहाँ सुरक्षा यह समझ विकसित करना, स्वयं को दूरदर्शिता में सबल बनाना ही महिलाओं के सशक्तीकरण  का पहला कदम है। आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक सुरक्षा के लिये स्वयं को मजबूत बना सकने में ही बुद्धिमानी है। वैसे कानून तो मजबूत और कड़े होने चाहिए लेकिन हम यह भी जानते है कि कानून की न्यायिक प्रक्रिया अत्यधिक लम्बी और लचर है। इसलिए लड़कियों का स्वयं निर्णायक दूरदर्शी और सर्तक होना अनिवार्य है तभी कुछ हो सकता है अन्यथा इसी आशा में कि तभी तो समाज सुधरेगा सिर्फ एक सपना ही रह जायेगा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माता-पिता लड़कियों के किसी भी निर्णय लेने में अगर मदद करें तो काफी हद तक दुर्घटनाये टल सकती है। माता-पिता यह कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि वे अपने-अपने काम में इतने व्यस्त है कि उन्हे समय ही नहीं मिलता। बच्चों में सही समझ की नींव डालना माता-पिता का पहला नैतिक कर्तव्य है यह उन्हें नहीं भूलना चाहिए। बाद में पछताने से कोई लाभ नहीं।
                                                           समय चूकि पुनि का पछताने
                                                             का वर्षा जब कृषि सुखाने।।

Holi

                                  होली
 आओ, होली खेले
हिल-मिल होली खेलें
खुशियों के रंग बिखेरें
आओं होली खेले-

लाल गुलाल हरा अबीर
नारंगी पीला -अंगूरी
खुशियों के रंग बिखेरे
हिल-मिल होली खेले

क्यों घबराते, क्यों सकुचाते
हाथ बढ़ाते हॅंसते गाते
आकर देखे, मिलकर देखे
गाकर देखे नाच के देखें

पल भर को हमसब दुख भूले
आओं हिल-मिल होली खेलें
खुशियों के रंग बिखेरें-



Sunday, March 31, 2013

Agman

              आगमन                                                                         
नवमी तक तो देवी के अर्चना के फूल उपवन में इक्का-दूक्का ही दिख रहे थे। चढ़ाने के लिये फू लों  की माँग थी। अंधेरे मुँह  ही यू ये फूल , चहरदिवारी से फांद कर भक्तों के द्वारा तोड़ लिये जाते थे। सुना है चोरी से तोड़े गये इन फूलों को जब देवी पर चढ़ाया जाता तब आधा पुण्य और आशीष फूलों की देख-रेख करने वाले व्यक्ति को भी प्राप्त हो जाता है लेकिन दशमी के दो दिनों के बाद ही घर के बगीचे मे एक आनन्दमय उल्लास सा छा गया। गुड़हल के लाल बिन्दों जैसे लटकते फूलों से पेड़ो की झाड़ी भर गयी पीले फूलों वाली लतर गदरा कर खिल गई। पीली आभा चारों ओर फैल कर दिव्य वातावरण बना रही थी। आम के पेड़ों पर असमय ही बौर थे एक मात्र आम को टिकोरा /छोटा फल/ लटक कर शुभ आगमन की सूचना के पट लहरा रहा था। उसके नये कोमल पल्लव पहले ताम्बई, फिर धानी रंग में कुछ अनोखा सौंदर्य बिखेर रहे थे। द्वार पर खड़े दो कदम के पेडों के फूल पीले और हरे लड्डुओं के रूप में हॅंस कर अठखेलिया करते प्रतीत हो रहे थे। लगता था छोटे बच्चों के खेलने के लिये ललचाते टपाटप धरती पर आकर फुदकने लगते। नन्हे मुन्ने बच्चों /कन्याओं की टोली ने/भोजन पर आकर घर आँगन  गुलजार कर दिया। सबने खुश होकर भर पेट खाया। तश्तरियाँ  ली और भोली मुस्कान से चहकते हुए अपने बारे में जानकारी दी। पता नहीं कैसा अजीब सा पवित्र वातावरण दैनिक अनुभूति सी हो रही थी।
कई वर्षों से उदास निराश मन मे अचानक इक जोत सी जगी घर में मेहमान तो आने ही वाला था। बार-बार विचार आने लगे। अब की सब कुछ बदल दो। दस वर्षों से एक ही रंग बदलवा दों। और समय पर पेन्ट भी आ गया और सब मनचाहा होने लगा। नया  बाथरूम, छोटा-सा बेडरूम छोटी-सी पैसेज, मेरी इच्छा है कि किचन का प्रवेश उधर से ही हो। ड्राईंगरूम से नहीं। नीला, हरा, गुलाबी हर कमरे का अलग रंग। बहुत खुशनुमा। कितनी बिलनियों के घर बने, चिडि़यों का झूले पर एक दूसरे को चारा खिलाना, लड़ना झगड़ना चलकना। फाख्ता का सिर उठा कर गर्वीली मुद्रा में चहल-कदमी करना और हाँ  प्यारे गुलाबी रंगों के गुलाब के फूलों की लतर जो नारंगी के पेड़ के साथ गले मिलकर फूलों के सखा बन बैठे है। उपर से मानों आशीषों की वर्षा कर रहे हो। फिशपाम के बड़े गमलों ने श्रीमान जी की प्रेरणा पाकर ग्रील के सामने प्रवेश द्वार पर सामने मण्डप सा बना दिया है मानों कुटिया का प्रवेश द्वार अंगूर की लता का किचन की खिड़की के उपर जाकर छा जाना मन को भा रहा था कटिंग-शटिंग के बाउ कोमल पल्लवो का अंगूरी रंग उमंग की हिलोरे मन में जगा रहा था। घर के अन्दर द्वार पर गणेश जी विराज गये। श्री राम लक्ष्मण सीता एवं हनुमान जी, स्वागत कक्ष को भव्य बनाया। न मालूम कौन सी दिव्यात्मा के आने के शुभ संकेत मिल रहे थे पिछले व महीनों से।
24 सितम्बर अष्टमी के दिन अकाएक दिन के 1ः30 बजे फोन की घण्टी घनघना उठी। गुड न्यूज जिसकी आप आशा कर रही थी। वह आ गया एक नन्ही सी परी जादू की छड़ी, फूलों की लडी, खुशियों की   शायद इसके आगमन के लिये ही इतनी तैयारियाँ  चल रही थी ‘गौरी’ के आगमन के स्वागत का इतना भव्य और आलौकिक आयोजन शुरू हो गई दौड़ धूप, हलचल, गाड़ी चालक नाना नानी बाबा दादी और मामी बुआ की प्यारी दुलारी। बाबा दादी की सुन्दरी-मुन्दरी, सोना-मोना गौरी के आने से गूजने लगा घर आँगन । कमरे की दीवारों की नीली आभा और गौरी के गुलाबी के कपड़ों का काम्बीनेशन में कुछ अधिक ही मोहक लग रहा था।

Sunday, March 24, 2013

Adhikar


                                             अधिकार
बात चाहे संसद की हो या सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए पदों  के आरक्षण की हो अथवा सम्पत्ति में बेटियों के अधिकार की। पुरूष वर्ग के आँखों  की किरकिरी बेटियाँ , माताये या बहने ही क्यों? मेरी यह समझ में नहीं आता
अभी मैं पुरूषवर्ग के एक प्रतिनिधि भाई के रूप में चरचा करना चाहूँगी क्योंकि इस समय पारिवारिक समस्याओं में यह भी दहेज समस्या की तरह फैलता जा रहा है जिसका न कोई आदि है और न अन्त। जब से इस बिल को मान्यता मिली है कि पिता की सम्पत्ति मे बेटियों का भी अधिकार है और कार्यरूप् में परिणित किया गया है बेटियों का मायका, भाई बहन का सम्बन्ध दाँव पर लगा हुआ है
पिता के रूप में एक पुरूष अपने बेटे-बेटियों को बराबर नहीं तो सम्पत्ति का कुछ भाग देने का मन तो अवश्य बनाने लगा है कहीं  -कही पर लिख कर कानूनी तौर पर मजबूत बनाकर पिताओं ने वसीयत लिखी हे और कहीं पर मौखिक रूप से /कह कर /बॅटवारा किया है या उन्हें दिया है। लेकिन है कि उन्हें यह भी लिखकर भाइयों को दे देना है कि‘हमें इसमें से कुछ नही चाहिए हम अपना अधिकार भाइयों के पक्ष में हमेशा के लिए छोड़ते है। अगर वे ऐसा नही करती तो उनकी पढ़ी लिखी वकील पत्नी भी उनका /पुरूषों/ पक्ष लेती दिखी। सच का सामना’ में पुरूषों  की हवस का व्योरा उनकी अपनी बेटिया पत्निया सहन करती रहीं और यह सब जान कर भी समाज परिवार से जुड़ी रहने को विवश रही? कहने का मतलब है कि सामान्यतः घरों में 20  लड़कियो का जीवन सुरक्षित और सम्मानित है।
महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा ने कहा कि बालिकाओं को बचाया जाना चाहिए क्या इसलिए कि बचाने के बाद आग लगा कर दहेज के लिए जला दिया जाय गर्भवती स्त्रियों को यह भी अधिकार नहीं  िकवह अपनी बच्ची को जन्म देकर उसके सुरक्षित भविष्य को निश्चित कर सके।
पुरूष प्रधान समाज में स्त्रियों, बालिकाओं के लिये कुछ भी स्वतंत्र नहीं। मेरे विचार से यदि स्त्री स्वयं सोच सके कि वह अपनी बच्ची के अस्तित्व और सम्मानित जीवन के लिए आवश्यकता पड़ने पर अपने परिवार के साथ स्वयं खड़ी रहेगी घर परिवार समाज के सामने उसके साथ मिल कर लड़ेगी लेकिन तिल-तिल कर अपनी पढ़ी-लिखी स्वतंत्र एवं उदार विचारों वाली प्यारी दुलारी बेटी को जीवित लाश नहीं बनने देगी। तभी इस संसार में उसकों लायें।
स्त्रियों की पग-पग पर दुर्दशा, जब जन्म देने वाले परिवार के, अपने खून के सगे सम्बन्धियों चाचा, पापा, ताया मामा आदि के बीच रह क रवह सुरक्षित नही है तो बनाये गये सम्बन्ध ससुराल आदि से तो आशा करना भ्रम है।
इससे बेहतर तो यही होगा कि भ्रूण हत्या को कानूनी सर्मथन दे दिया जाये। कम से कम समाज में परिवार में माताओं को अपनी बेटियों को जीते जी मरते तो नहीं देखना पड़ेगा।
कानून की लाचार न्याय व्यवस्था? समाज सरकार कितना भी ढ़ोल बजा ले प्रगति का, उदार मानसिकता का मगर हे वह वहीं का वहीं बर्बर , संवेदनहीन और अनैतिक कितनी बेटियांे की बलि दी जायेगी इस आशा में कि कभी तो स्थिति बदलेगी कभी तो उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होगा। बस एक ही उपाय है इसका उनको संसार में लाने का पूरा अधिकार जन्म देने वाली माॅं को ही होना चाहिये वह भी वैधनिक।

Shiksha---jeene ki kala

                                                    शिक्षा-जीने की कला
समाज के वर्तमान समय में बच्चों में शिक्षा के प्रति लोगों में एक क्रान्ति की भावना का विकास हुआ है। चली आई हुई वर्तमान शिक्षा पद्धति और उसके प्रभाव ने लोगो को निराश और हतोत्साहित किया है। और जब चारों ओर से सब दरवाजे बन्द दिखाई पड़ते है तो एक नया झरोखा और आशा की किरण, प्रकाश का दीपक प्रस्फुटित हो उठता है। जनमानस उद्विग्न और व्याकुल होकर सोचने लगता है नई दिशाये, नये विचार सिद्धांत बदलाव तथा परिवर्तन। यह परिवर्तन सकारात्मक होता है, उद्देश्यपूर्ण होता है और अनेक लोगों का सामूहिक प्रयास सार्थक होने लगता है। जन समर्थन मिलने लगता है। परिणाम, प्रभाव अपनी पूरी सक्रियता से दिखाई पड़ने लगता है। प्रायः संघर्षों में नये संकल्प बनते है।
आप सबकी चिन्ता का विषय यही है कि शिक्षा में गुणवत्ता का विकास किस प्रकार हो तथा उसके सुधार से वह आज के युवा वर्ग को किस प्रकार सहायता कर सकती है। सही और गलत उचित और अनुचित की पहचान करने में तथा समाज के आस-पास के वातावरण के पति जागरूकता तथा उसे समझने तथा जानने मे।
    शिक्षा हमारे देश में कल के सक्षम नेताओं के विकास करने में कैसे सहायक हो सकती है? ऐसे नेता जो सबको समान रूप् से न्याय दिलाने में समर्थ हो। जो जड़ से जाति -पाति , उच-नीच, गरीब और अमीर के भेद को जड़ से उखड़ फेके और देश को सुरक्षा प्रदान कर प्रगति के पथ पर अग्रसर करें। हमारे सपनों के भारत को मूर्त रूप दे सकें।
नैतिकता का पतन सही गलत अनुचित की सीमा को पार कर जाना। विवके बुद्धि का। यह बताता है कि शिक्षा अपनी गुणवत्ता के प्रभाव को जमा पाने में असफल सी हो रही है। दोष किसे दिया जाय। यह समय इन आलोचनाओं पत्यालोचनाओं का नही है वरन् ठोस कदम उठाने का है। शिक्षा का व्यापक अर्थ है मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समुचित विकास छात्रों के सन्दर्भ-कक्षाये उत्तीर्ण करते हुए अंको और डिग्री के प्रशस्तिपत्र किसी को शिक्षित नही बनातें। वह ज्ञान का भण्डार विकसित करते है सूचनाओं को एकत्रित करते है यह भी शिक्षा का एक भाग, अंग है जिसे हम थेओरी  कह सकते है। परन्तु डिग्री वास्तविक शिक्षा में तभी कार्यान्वित /बदलती है/ जब उन सूचनाओं और ज्ञान को हम नित्य प्रति दैनिक जीवन में आवश्यकता पड़ने पर समाज, मनुष्य के कल्याण के लिये इस्तेमाल करने में स्वतंत्र सफल और सक्षम हो। वह तभी सार्थक है। संवेदनाओं के साथ सामाजिक नैतिक आर्थिक रानैतिक सभी क्षेत्रों में उसे लागू कर सके।
यह एक कठिन कार्य अवश्य है। मगर असंभव नहीं। कहा जा सकता है बचपन से जो बच्चों के अन्दर नैतिकता के बीज बोये जाये वो बड़े हेकर पनपेंगे और समाज तथा मानवीय स्तर पर, हर वर्ग को ऊंचा  उठायेगे उसकी जड़े काफी गहरी और मजबूत होगी। है तो बड़ा ही आदर्शात्मक। परन्तु विडम्बना यह है कि ऐसी नयी पौध बढ़ने से पहले ही समाज के तथाकथित महान ठेकेदारों द्वारा कुचल दिये जाते हैं। इससे पहले कि नये स्वच्छ वातावरण का निर्माण वो कर सके वर्तमान जीवन के भ्रम के चकाचैंध में खो जाते है।
      आवश्यकता है कि उन्हे भी युक्तियाँ  मालूम हो कि इस विषम चक्रव्यूह से सफलतापूर्वक निकल कर अपने आदर्शों और सिद्धांतो का परचम लहरा सके। उन्हे अपने आदर्शो पर हर हालत में सफल होकर दिखाना होगा। तभी सारे प्रयास सफल होंगें। सुझाव मात्र यह है कि जिस प्रकार वट वृक्ष की लम्बी जटाये वृक्ष के उपरी भाग से लटक कर जमीन में गहरी मजबूत जड़े बनाती है उसी प्रकार समाज में, घर में परिवार में, कार्यक्षेत्र में, आॅफिस में बाजारों  में उपर-नीचे, अगल-बगल चारों दिशाओं से परिवर्तन की प्रक्रिया क्रियाशील हो एक ही समय में एक ही साथ तो अपेक्षित परिवर्तन होने में समय न लगेगा।
 जिनके पास वर्तमान में यह शक्ति / धन, पद, बल/है उन्हें जाग्रत करना होगा। उन्हें विश्वास कर इस कार्यक्षेत्र के लिये उन्मुख करना कहीं अधिक व्यवहारिक होगा। उसके परिणाम तुरन्त दिखाई पड़ेगे अपेक्षा इसके कि जमीन को खोद कर नीव ही बदली जायें।
सत्यता, इमानदारी, कार्यकुशलता नैतिकता के धनी व्यक्तियों को ढ़ूढ कर अधिक से अधिक संख्या में उजागर किया जाये। मान्यता दी जाये ।तो वही दूसरो के लिये आदर्श और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का विषय और प्रेरक बनेगा सही दिशा में सोचने के लिये लोग बाध्य होने लगेंगे और जब लोगों को इसकी प्रमाणिकता व्यवहारिक जीवन में अधिक से अधिक मिलने लगेगी तो समाज का वातावरण बदलने में समय न लगेगा। यह परिवर्तन उपर-नीचे, बड़े-छोटे, नये पुराने अगल-बगल चारों ओर से होगा और इसके हवा पानी में ये कोमल स्वस्थ नैतिकता के बीज पनपेंगे, विकसित होंगे, लहलहायेंगे और कोई भी भ्रष्टाचार, बेइमानी धोखाधड़ी षड़यंत्र का प्रचण्ड झोंका उन्हें मुरझा नहीं सकेगा।

Sunday, February 24, 2013

Lahoo ke do rang

                                                                लहू के दो रंग
किसी की वाणी में इतना भी जादू हो सकता है, खेलों में इतना अधिक प्रभाव हो सकता है कि उसे देखे बिना ही केवल पढ़ उसके पीछे चल पड़े थे। वैसा ही कुछ शायद मेरे साथ भी था। स्थानीय समाज सेविका श्रीमती दामोलकर को देखने का मौका मुझे कभी न मिला था जब तब उनकी वार्तायें रेडियो पर सुनी थी। स्थानीय दैनिक-अखबार में अक्सर उनके लेख छपते। रविवार के दिन तो विशेष कालम में उनका लेख पढ़कर मेरा मन रोमान्चित हो उठता। दया से द्रवीभूत हो उठता मेरा मन समाज के उन असहाय शोषित निर्धन वर्ग विशेष के प्रति।कितनी कयणामयी होगी वह ममता की मूर्ति। आज जब अपना विश्लेशण करने बैठी हूँ तो लगता है कि कहीं मेरा किशोर मन उनके प्रति एन्फालुएल्टेड या हीरो वर्शिप की भावना से ग्रसित था।
    इस बार हिन्द्री दैनिक में उनका लेख था ‘‘हम एयर कन्डिशन्ड भव्य सुख सविधाओं से युक्त कमरे में बैठ कर उस मजदूर दलित वर्ग के दुख और शोषण की कल्पना भी नहीं कर सकते। छोटे-छोटे बालकों से मजदूरों के समान रात दिन काम करवाना उनके साथ अन्याय ही नहीं उनकी हत्या करना है छोटी सी खिलती कली को मसल डालना है। हमें इसके विरूद्ध आवाज उठानी चाहिए। ’’कितनी ही सभाये उनके द्वारा आयोाजित हुई होंगी। कितनों को उन्होंने मानवीय अधिकारों की लड़ाई में  विजय दिलावाई। बच्चों को हमने अधिकार दिलवाये उनके माँ बाप, तथा नारियों को शोषण की नारकीयता से मुक्ति दिलवाई। धन्य है वह नारी जिसने इतनी जागरूकता फैलाई। चैतन्यता का बीज बोया उनकी अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से परिचय करवाया।’’
    जब-जब मैं कुछ दूर पर बन रहे सामने वाले घर में बच्चों को दौड़ कर एक-एक ईटों को उठाते, करीने से सजाते, जमीन को खोदने का असफल प्रयास करते मैं देखती तो म मिसेज दामोलकर की बड़ी याद आती है। काश वह यहा होती तो मैं उन्हें यह दृश्य दिखला पाती।
     राची  के अशोक विहार पुरम कालोनी बड़ी पाश, मुख्य शहर से दूर, दोनों तरफ गाव से घिरी, एक तरफ छोटी पहाड़ी नदी के निकट बसी बड़ी तेजी से विस्तार पा रही है। चैड़ी साफ सुथरी सड़कें सुन्दर सा मार्केट, कम्यूनिटी हाल कुछ नये नर्सरी स्कूल आदि तथा एक से बढ़कर एक सुन्दर घर तथा भव्य इमारते। किसके पास कितना पैसा है और वह उच्चवर्ग की किस श्रेणी में स्वयं को रखता है इसका अन्दाजा इमारतों, भवनों को देखकर बड़ी ही सहजता से लगाया जा सकता  है। गाव  के पास बसा होने के कारण गाव की मोहकता, शहर की भीड़-भाड़ से दूर बहुत शान्त और मनोरम। कुनमुना-कर सोये शान्त शिशु सा। सुबह बड़ी ही सुहावनी।
     पास के गाव  के अधनंगे बच्चे, कन्धे पर दोनो ओर छोटी-छोटी बांस  की टोकरिया रखे, घूमने के आकर्षण से घिरे गोबर लकड़ी चुनने के बहाने टोलियाँ बनाकर सुबह-सुबह ही निकल पड़ते हैं। शायद उन लोगों में भी होड़ लगी रहती है कि कौन सबसे पहले और सबसे ज्यादा सामान इकट्ठा करता है। या फिर सिर पर टोकरी, हाथ में छोटी-छोटी कुदालियाँ  लिये गाव  की स्त्रियाँ गायों के लिये, घास छिलने, साहब लोगों के बड़े विशाल बॅगलों के चक्कर काटती है। दो तीन औरतों लड़कियों का दल रहता है। मौका देखते ही धड़ाधड़ गेट खोल कर भीतर घुस जाता है। आठ बजते सभी घरों से मोटर गाडि़यों का निकलना शुरू हो जाता है 10 बजते पूरी कालोनी खाली।
     मै इसी कालोनी के एक बड़े बंगले के गैरेज पोर्शन में रहती हॅू कालेज में बीण्एण् की छात्रा हूँ । अपनी मासी के साथ लगभग दो साल से रह रही हूँ 10 बजे से मेरे क्लास होते है। अक्सर ही बाल्कनी में आ खड़ी होती हूँ । सामने कुछ दूरी पर दो मंजिला घर बन रहा है। बड़े जोर शोर का रूप सजाया सवांरा जा रहा है। मैं देखती हूँ  9 बजते-बजते मजदूरों और रेजाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक मेमसाबह रोज समय पर घर बनवाने आती है। कोई दिन भी ऐसा नहीं बीतता जिस दिन किसी मजदूर के पैसों को लेकर झड़प न होती हो चेहरा आदि तो दिखाई नहीं पड़ता मगर हल्ला गुल्ला सबका घेरा बनाकर एक साथ खड़ा हो जाना और फिर कुछ देर बाद काम का शुरू होना दिखाई पड़ता था।
     दो तीन दिन से देख रही हूॅं कि गोबर चुनने वाले छोटे-छोटे बच्चों की टोली जुटी उस घर के मेम साब के आस-पास खड़ी होती है और काफी हंस कर बाते करती रहती है। नंगे बदन 8-12 साल के दुबले पतले बच्चे। मुझे लगा कितनी अच्छी होगी वो।
    दूसरे दिन ठीक नौ बजे वही बालक टोली बड़ी मुस्तैदो से अपने काम में जुटी है। फावड़ा लिये कोई खोद रहा है कोई  घास उखाड़ कर फेंक रहा है कोई ईंटे लगा रहा है। वे बाल गोपाल ही लग रहे थे। फूलों की क्यारी बन रही थी फूल जैसे कोमल हाथों से। बच्चों में काम करने का उत्साह, गोबर से भरे बहंगी को कोने में रखकर कपड़े के एक छोटे टुकड़े से अधोतन को ढ़के हुए ये बालगोपाल कितने दृढ़ प्रतिज्ञ लगते। आशा दीप से जल रहे उनके नेत्र धन प्राप्ति के लोभ में साम्यर्थ से भी अधिक कुछ करने की तैयारी कर रहे थे।
    मई जून की चिलचिलाती धूप। बाहर गर्म हवा के बगूले और लू एक क्षण भी बाल्कनी में खड़ा होना मुश्किल है। कालेज से लौटते-लौटते 12ः 30-01ः 00 बज ही जाता है। गला प्यास से सूख जाता है पसीने से तरबतर आकर घर में तेजी से पंखा खोल देती हूँ  मगर ये कर्मयुद्ध के सिपाही नन्हें बाल मजदूर तैनात हे अपने मोर्चे पर। कुछ देर तक लेटती हूँ  मगर मन नहीं लगता तो दरवाजा खोल कर बाहर झाकती हूँ  गर्म हवा का एक झांेका, झपास मार कर अन्दर घुस जाता है। खड़े होकर सामने देखती हूँ घर बनने का काम पूर्ववत हो रहा है उस पर इन गर्म तीखी प्रकाश और ताप काह कोई प्रभाव नहीं। दरवाजा बन्दकर फिर लेट जाती हूँ । पास में अधूरी पड़ी पुस्तक को फिर से उठा कर लेती हूँ । कुछ पल पढ़ती हूँ कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आती है। उठती हूँ -दो छोटे बच्चे एक घायल बच्चे को सहारा दिये दरवाजे पर खड़े है। कुछ दवा दीजिये न’? कितनी ज्यादा चोट लगी है इसे,कहाँ से लगी चोट? उस घर में हम काम करते है। तुम लोग --- क्या काम करते हो ---? अभी सुबह का स्कूल है दिन भर खाली रहते हैं। थोड़ा कमा लेते है।’’कितना मिल जाता है?- - - मैने घाव को पानी से धोते हुए पूछा हम तीनों के एक-एक रूपया रोज। दो दिन हो गये 6 रूपये मिल गये कुल पैसों मे 6 रूपये और मिल जायेंगे क्या करोगे इन रूपयों का।’’ एक दूसरे के पीछे छिपते शरमाते 8-12 वर्षों के उत्साही बच्चे बोले 3,5,7 मे पढ़ते हैं हम। थोड़ा-थोड़ा जमा कर लेंगे स्कूल के पोशाक के लिये।’’ और नाम क्या तुम लोगों का,- बाही, मुन्ना और बन्दी।
    बन्दी उसमें सबसे बड़ा था बाही उसके बाद और मुन्ना शायद सबसे छोटा। लेकिन काम  करने का उत्साह, की चमक उसमें सबसे ज्यादा थी। जिस लगन से वे काम करते मेरे मुख से तारीफ निकल ही जाती। और एक दबी सी आह भी। इतने छोटे बच्चे कुल मिला कर किसी भी तरह उतना ही काम कर लेते है दो दिन की मेहनत का मात्र 2 रूपये इतना शोषण कलप-कलप उठता मेरा मन काश मैं मिसेज दामोलकर से मिल पाती उन्हे दिखलाती कि मजदूरी महंगी हो जाने के कारण दर-दर भटकते इन बच्चों पर क्या गुजर रही है। जरा से पैसो के लालच में अपनी शक्ति से कितना अधिक करने का प्रयास है इनका और काम करने में सफल भी है।
     लाल दवा लगाकर सहानुभूति से मैंने कहा लो इससे ठीक हो जायेगा?। कभी जरूरत हो तो यहीं आ जाना और वे उछलते कूदते चले गये।
     उस दिन कालेज मे ही पता चला था बाल मजदूर नवजागरण पर मिसेज दामोलकर का भाषण निकट के मैदान में होने वाला है। अन्तिम दो पीरियड न होने के कारण मैं उनका भाषण सुनने का मोह न छोड़ सकी काफी भीड़ थी बड़ा जोरदार भाषण रहा। मैं उनके बोलने के ढंग पर मुग्ध थी कितनी सटीक, भावपूर्ण सहज और मार्मिक उक्तियाँ  थी मंच से उतरते ही सबने उन्हें घेर लिया बड़े प्यार से दुलारते सहलाते वे एक देवी सी लग रही थी। मेरा मन श्रद्धा से झुक गया। निश्चय किया अपने घर के सामने होने वाली घटना से मै उन्हें अवश्य परिचत करवाउंगी   इनसे जरूर मिलवौंगी  जहां  ये शोषण हो रहा है संसार में कितने तरह के लोग है कहाँ ये दामेलकर, और कहाँ वह कठोर निर्दयी निष्ठुर भावहीन इमारत वाली महिला दोनों ही अलग म्गजतमउम पर।
     भाषण के प्रभाव से डूबता उतराता मेरा युवा मन कुछ कर गुजरने को ब्याकुल हो उठा रात भर उन्हीं कल्पनाओं में खोयी रही। सोचा पहले 9 बजे जाकर बच्चों के साथ उन महिला से मिलूँगी तब दामेलकर को लेकर जाऊँगी । वे जरूर मेरे आयेगी करूणामय, बच्चों के लिये तो उनका रोम-रोम विह्वल है।
     सुबह का मुझे बेसब्री से इन्तजार था बाल मण्डली आ जुटी थी आज उनकी संख्या ज्यादा थी धीरे-धीरे मैं उस इमारत की ओर बढ़ रही थी। दूर से एक मध्यम कद, की, सिल्क  की प्रिंटेड साडी  दिखाई पड़ रही थी चेहरा साफ नहीं था डाटने की काम न करने की किसी बात पर जोर-जोर से बिगड़ रही थी, ‘‘अगर इतने ईट उठाकर ठीक से नहीं रखे गये जगह पूरी साफ न हुई तो कल के पैसे भी नहीं दूंगी न जाने कहाँ से चले आते हैं ये छोकरे, नालायक कहीं के’’ मेरी ऑंखें  उन बच्चों को खोज रही थी मगर वे दिखाई न पड़ रहे थे निकट पहुँच  कर पीछे से क्रोध और आक्रोश से लगभग चीखकर मैने कहा सुनिये मैडम -- क्या अपने इन बच्चों को काम पर लगाया है--- वह अचानक घूमी - ‘‘क्यों क्या बात है? आपको क्या तकलीफ है? रूक्ष और झुंझलाये स्वर मे उन्होंने घूमकर कहा-
    मेरा मुख आश्चर्य से खुला रह गया आवाक- - - कल की भाषण देने वाली मिसेज दामेलकर , मेरी आदर्श - - -हाँ  बिल्कुल वहीं - - - वही- - - चेहरा - - - आप --? हकलाते हुए मेरे आगे शब्द मुँह  में ही रह गये क्या क्या हुआ? क्या चाहिये।
    मेरा सारा जोश ठंडा पड़ चुका था जी मेरे मन की अमोल प्रतिमा खण्डित हो चुकी थी कुछ नहीं - -- सारी धीमी गति से मैं लौट पड़ी सोच रहीं थी मिसेज दामेलकर का कौन सा रूप सही है वह कि यह---?